कोरोना ने बता ही दिया हमारी जरूरतें क्या हैं,और कितनी है….

“होमेन्द्र देशमुख भोपाल”

इन दिनों ज्यादा भूख नही लगती । भोजन सुहाता तो है ,पर पेट जल्दी भर जाता है , वरन दस-दस रोटी एक ही बार मे पेल देते थे । रबड़ी , रायता, मालपुआ , पंजाबी चायनीज , कांटिनेंटल ।

अब मन ही नही लगता । ज्यादा खाने में मन नही लगता या कम भोजन से तृप्त हो जाते हैं । जरा सोच कर देखिए । कम खाना दुःख नही ,सुख की निशानी है । महामारी तो चेताने अब आई है । बिगड़ी जीवनशैली और अधर्म , दुःख की महामारी से हम पहले ही बहुत जकड़ चुके थे ।अब तो हम उस कृत्य से मुक्त हो रहे हैं । इसीलिए हमारा भोजन भी कम हो रहा है और हम तब भी खुश हैं । उसी प्रकृति में हमे अब ईश्वर के दर्शन और शांति और सुकून का एहसास हो रहा है ।

इसी प्रकृति में अब हमें धर्म नजर आने लगा है ।चिड़ियों का कलरव, उगते सूर्य की आभा , हवाओं की मादकता , फूलों का सौंदर्य , डूबते सूरज की लालिमा । ये सब अद्भुत नजर आने लगे हैं । कहां खो गए थे हम अपने कृत्यों में , कि ये सुख के क्षण गौण हो गए थे । जब सब कृत्य बंद हो गए तब इसी प्रकृति में अब हमें धर्म ,ईश्वर नजर आने लगे हैं । सुखद अनुभूति लिए बहुत लोग लेखक और कवि भी हो गए हैं । प्रकृति से संयुक्ति महावीर की युक्ति और उपदेश है । आज वही सार्थक हो रहा है ।

जब सारा संसार बीमार और दुःखी हो तब, हम सब भी किसी सुख की आकांक्षा नही कर रहे । एक ही इच्छा, एक ही अनुनय -विनय कि ये बीमारी यह दुःख चला जाय । सुख तो अनुभूति की बात है ।

“जीवन मे साधनों की भूख भी हमारा रोग ही है “

ज्यादा की आकांक्षा हमारे बीमार होने का ही संकेत है ।
शरीर की जरूरत चार रोटी और दाल । आज बीमारी और महामारी के डर ने हमें घरों में कैद कर के रख दिया है । लेकिन पेट की जरूरत बताकर की अतिरिक्त भोजन की बीमारी से हम अपनी चेतन से मुक्त हो रहे हैं ।

योग की भाषा में तीन नाड़ियां हैं – इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना । इड़ा एक तरफ, पिंगला दूसरी तरफ, मध्य में है सुषुम्ना। मध्य में रहना ही जीवन के लिए उपयुक्त है । न बाएं झुको न दाएं झुको। न त्याग न भोग , मध्य में आ जाओ। न बहुत खाओ न उपवास करो मध्य में आ जाओ। न संसार में आसक्ति रखो न विरक्ति रखो मध्य में आ जाओ। न तो संसार में ही डूबे रहो और न संसार से भाग जाओ, मध्य में आ जाओ।

संसार में भोगी तो चूकता ही चूकता है, त्यागी भी चूक जाता है। भोगी चूक जाता है, क्योंकि धन, पद, प्रतिष्ठा के पीछे पागलों की तरह भागता है। त्यागी छूट जाता है, क्योंकि वह इसके विपरीत भागता है । जोर से पकड़ना भी गलत है। छोड़ने की इच्छा भी गलत है। न तो यहां कुछ पकड़ने योग्य है, न कुछ छोड़ने योग्य है। बस संतुलन बनाना है । महावीर ने इसे सम्यकत्व कहा है। मध्य में आ जाओ। समतुल हो जाओ।

भगवान बुद्ध ने भी कहा है है जियो ऐसे जैसे भंवरे फूलों से रस चूसते हैं । भंवरा फूलों को नही फूलों से रस चूसता है । उससे न फूल की सुगंध कम होती है न ही कम होता है उसका सौंदर्य ..

अख़बार बंद पेट्रोल बंद पकोड़े बंद मैगी बंद दूध बंद गली से गोलगप्पे बंद नुक्कड़ से चॉकलेट आइसक्रीम बंद,रंग बिरंगे शैम्पू बंद, खुशबूदार साबुन बंद ,फैशन की दुकान बंद चेहरे का श्रृंगार बंद गुड्डू का वैेन बंद,ट्वीशन बंद सेल बंद । सारे कृत्य बंद हो गए । कुछ जरूरी कुछ गैर जरूरी ।

अच्छे पकवान और उत्सव बाहरी आनंद का प्रदर्शन है । पर यह भी पूरी तरह सही नही कि उत्सव और आनन्द मनाने वाला रुग्ण है । लेकिन असल आनन्द भीतर है । दाल रोटी का मतलब अभाव नही उसी सम्यक या मध्य मार्ग के आनन्द का प्रतीक है ।

बस, घर मे दाल रोटी से काम चल सकता है । यह समय सोचने का है । हमारी न्यूनतम जरूरत क्या है ।
मौका है अपनी आदतें परमानेंटली सुधार लो । कोरोना की एक possitive चीज ले लो । सुख की अनुभूति में शरीर को न ज्यादा भोजन की आवश्यकता है न ही भूखा रहने की जरूरत । मध्य मार्ग से जीवन चल सकता है ।

चलते चलते ..

मंगलवार को प्रसारित रामायण का यह एपिसोड याद करने योग्य है । अपने ही भाई के वध का कारण मान ग्लानि में डूबे सुग्रीव को श्रीराम समझाते हुए कहते हैं –

” जिस तरह दावानल (जंगल मे स्वतः लगने वाली आग) जंगल को जला कर उसका नाश कर देती है ,वर्षा की बूंदें पड़ते ही ठूंठ से नई कोपलें फूटती हैं और जंगल का फिर श्रृंगार कर देती हैं । ये अवसाद ,दुःख के क्षण, जीवन को फिर से श्रृंगार करने का अवसर है..

आज बस इतना ही ..!

(लेखक सीनियर वीडियो जर्नलिस्ट हैं)

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