17 अप्रैल : भारत की राजनीति और महाभारत के “कृष्ण”…!

_होमेन्द्र देशमुख_ :

20 सितंबर 1999 मध्य रात्रि भोपाल से चलकर गुना मार्ग पर बसे कस्बा ब्यावरा के होटल एसी अग्रवाल पहुचे । सुबह श्री कृष्ण के संग चुनाव प्रचार में जाना था । जिस राष्ट्रीय टीवी चैनल के लिए हमें कुछ खास सेलेब्रिटी के चुनाव प्रचार में 24 घण्टे उनके साथ रहकर ,उनका कैम्पेनिंग कवर करना था उसमे आज श्री कृष्ण के चुनाव क्षेत्र की बारी थी ।

नीतीश भारद्वाज ने 90 के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित धारावाहिक महाभारत धारावाहिक में कृष्ण की गौरवमयी पात्र को जीवंत कर दिया था । अगर महाभारत श्री कृष्ण की लीला है तो कृष्ण स्वयं उस लीला के प्रमुख पात्र भी हैं । मुस्कान लिए भोले सांवरे श्री कृष्ण ने भारत के घर घर और दिलों में अपनी जगह बना ली थी ।

कृष्ण अर्थात अभिनेता नीतीश भारद्वाज । उन दिनों वे घर-घर और दर-दर पूजे जाने लगे थे । 6-7 साल बाद भारतीय जनता पार्टी ने उनकी इस लोकप्रियता को भुनाने मप्र के राजगढ़ सीट से प्रत्याशी बनाया था । तब वे एक बार जमशेदपुर से कुछ दिनों के लिए सांसद रह चुके थे ।

मप्र के राजगढ़ से दिग्विजय सिंह भी सांसद रहे । खांटी हिंदुत्व और आर एस एस प्रभाव वाला क्षेत्र होने के बाद भी पिछले उपचुनाव और आम चुनाव मिलाकर लक्ष्मण सिंह ही यहां से तीन बार जीत चुके थे । छोटे राजा के इस तिलस्म को कोई तोड़ नही पा रहा था । उसका एक कारण लगातार उसी क्षेत्र के पूर्व सांसद और इसी दौरान राज्य के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और कांग्रेस का शासन भी था । हर बार लगता था लक्ष्मण सिंह अब हारे कि तब हारे, लेकिन आखिर जीत वही जाते थे । 1999 के इस मध्यावधि चुनाव में उनका तिलस्म तोड़ने स्वयं भगवान कृष्ण को उतरना पड़ा था ।

महाराष्ट्र के एक कुलीन प्रतिष्ठित परिवार में जन्मे नीतीश भारद्वाज घोड़ों के डॉक्टर बनने के बाद एक्टर बन गए थे । अच्छे थियेटर आर्टिस्ट ,और कुछ फिल्मों के बाद उन्हें बी आर चोपड़ा के बहुचर्चित धारावाहिक महाभारत में श्री कृष्ण की भूमिका मिली थी । धारावाहिक खत्म होने के बाद वे पुनः कुछ फिल्मों के साथ अपने पसंदीदा थियेटर कर्म में लग गए थे ।

चुनाव प्रचार को 5-6दिन और बचे थे । मानसून अब चला चली की बेला में था । लेकिन दोपहर की तीखी धूप के साथ किसी किसी शाम बारिश भी हो जाती थी । ब्यावरा ,राजगढ़ लोकसभा के फैले लंबे क्षेत्र को कवर करने के लिए रुकने की मुफीद जगह थी । उस लाजनुमा होटल में दो ही एसी कमरे थे । एक कमरा राजगढ़ लोकसभा से बीजेपी प्रत्याशी नीतीश भरद्वाज के पास ही था ।

बाहरी‘ प्रत्याशी होने के कारण चुनाव तक वो यहीं ठहरे थे । मुझे उसी दौरान ही पता चला कि ऐसा भी होता है.., कोई भी बाहर से आकर स्थानीय जनता का प्रतिनिधि बन सकता है । वैसे भी यह निर्वाचन क्षेत्र अतिथि प्रत्याशी क्षेत्र बन गया था । कैमरामैन होने के नाते मैंने भी सुबह से दिन भर साथ रह कर शूट प्लान किया था ।

नीतीश भारद्वाज का चुनाव प्रचार में सुबह 9 बजे निकलने से पहले हमें कमरे में ही एक लंबा इंटरव्यू करना था । रिसेप्शन से सीधेे कनेक्टिविटी नही थी । दस और ग्यारह बज गए । कुर्ते पजामे पहनने वाले ,एक वयोवृद्ध खांटी नेता उनके सुबह की तैयारियों में व्यस्त दिखे । कभी कपड़े प्रेस करवाते कभी नाश्ता की व्यवस्था करते । वह भी निकलने का समय बताने में असमर्थ थे ।

बड़ी मुश्किल से एक छोटे से इंटरव्यू के साथ चुनाव प्रचार का वह दिन शुरू हुआ । उस दिन ब्यावरा से करनवास और बोड़ा होते हुए राजगढ़ लोकसभा के अंदरूनी कस्बे तलेन तक जाकर पचौर होते वापस यहीं लौटना था ।

उन्हें देखने की होड़ मच रही थी । महिलाएं भी उनके दर्शन के लिए आतुर थीं। श्री कृष्ण गाड़ी के सामने सीट पर बैठे बैठे ही सब का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे । कोई आरती उतार, तो कोई दूर से प्रणाम कर धन्य हो उठता।

छलिया ‘भगवान श्री कृष्ण’ भी भक्तों को देख मंद-मंद मुस्कुरा देते थे। चौक-चौराहे पर गीता का श्लोक ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत: जैसे संवाद वोटरों में जोश भरने की कोशिश कर रहा था।

पहली सभा बोड़ा गांव में थी । दोपहर का समय 12 बजे के बजाय अब देर होने के कारण लगभग तीन बजे छोटी सी सभा होनी थी । उस समय अच्छी खासी धूप थी । पर अक्सर स्टार्स को धूप से परहेज होता है ,ऊपर से भीड़ और बाहर सितंबर महीने की उमस , सो सभा को गाड़ी के अंदर एक माइक लेकर करना पड़ा । थोड़ी शाम हुई ,रोड शो के साथ एक दो बड़े गांव में लड्डू और फूलों से उन्हें तौलने की तैयारी थी । किसी ने बांसुरी भी पकड़ा दी । कृष्ण के रूप में लोकप्रियता के कारण गाड़ी से उतरते ही लोग पैर छूने उमड़ पड़ते यही उनकी समस्या भी बन जाती । इसलिए वह गाड़ी से शायद कम उतरते ।

महाभारत में कृष्ण के एक दो उपदेश वाले डायलॉग और श्लोक -“पवित्रणाय साधुनाम… शुरू कर झट आगे बढ़ जाते । बाकी का श्लोक श्रद्धालु जनता ,बड़े जोश के साथ पूरा कर देती । इस दौरान लोगों से जुड़ाव और जीत के जुनून का कुछ अभाव भी दिख ही जाता । तलेन पहुँचते पहुँचते रात और बारिश दोनो हो गई । गाड़ी के गेट के सामने खड़े होकर भाषण शुरू किया ही था कि बिजली गुल हो गई । और रोशनी की कमी के कारण हमने भी वहीं से उनका साथ छोड़ दिया ।

17 अप्रैल 1999 को, एक वोट के कारण राजनीति के कृष्ण अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार मात्र 413 वें दिन गिर गई थी और 26 अप्रैल को 12 वीं लोकसभा भंग कर दी गई । मध्यप्रदेश के ही स्वर्गीय कुशाभाऊ ठाकरे तब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे ।

इसी साल हुए कारगिल के युद्ध और वैकल्पिक अस्थायी सरकार के लिए सहानुभूति के अवसर के साथ 6 अक्टूबर 1999 को आए एकतरफा लहर वाले परिणाम में, बीजेपी के प्रत्याशी , महाकाव्य महाभारत के ‘कृष्ण’ और धारावाहिक के लोकप्रिय कलाकार नीतीश भरद्वाज यह चुनाव हार गए थे ।

हालांकि भगवान कृष्ण ने यूं तो कई असुरों का वध किया जिनमें पूतना, शकटासुर, कालिया, यमुलार्जन, धेनुक, प्रलंब, अरिष्ठ आदि। कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने अपने जीवन में महाभारत सहित दस युद्ध लड़े या उनका संचालन किया । लेकिन राजनीति के इस युद्ध मे भोले भाले कहे जाने वाली यहां की कृष्ण-भक्त जनता ने उन्हे हार का आईना दिखा दिया ।

बाहरी या सेलिब्रटी को गांवों की जनता अक्सर पूजा तो कर लेती है लेकिन वोट वह अक्सर अपने आसपास, सुख दुःख में साथ रहने वालों को ही देती है । बिरले उदाहरण हो सकते हैं । स्थानीय नेताओं से पटरी बैठाना ,उन्ही के भरोसे टिकना और क्षेत्र के साथ स्थानीय जनता से लगाव और उनका विश्वास जीतना बड़ा चैलेंज होता है । शायद यहां भी वही हुआ ।
इस तरह कृष्ण यानि नीतीश अपने जीवन का बड़ा राजनैतिक युद्ध हार गए ..

रामायण के राम अरुण गोविल ने रामायण में भूमिका से पहले राजीवगांधी के चुनाव में प्रचार का काम किया था । उन्हें फरीदाबाद से लोकसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भी आया था पर उन्होंने रामायण में अपनी भूमिका को ही चुना । और शूटिंग करने उमरगाम पहुच गए ।
सीता दीपिका चिखलिया भी बाद में बीजेपी से सांसद बनीं ।

नीतीश हंसमुख और साफदिल इंसान हैं । उनका भोला भाला चेहरा आज भी वही मुस्कान लिए होता है । लेकिन महाभारत में श्री कृष्ण का चरित्र और भारतीय राजनीति के पात्रों के चरित्र में जमीन-आसमां का फर्क है…

कोरोना काल मे इन दिनों दूरदर्शन पर पुनः प्रसारित हो रहे धारावाहिक महाभारत और नायक श्री कृष्ण के चुनाव काल की यह कहानी सहसा याद आ गई ..और याद आ गए राम और सीता की राजनैतिक कहानियां !

तब के सहयोगी और अब मित्र, कमलेश मालवी के साथ…

आज बस इतना ही..!

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