आदिवासियों का अस्तित्व बचाने कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ लड़ना जरूरी : पराते

रायपुर(खबर वारियर)छत्तीसगढ़ और पूरे देश में आदिवासियों का अस्तित्व बचाने के लिए कॉर्पोरेट लूट के खिलाफ लड़ना जरूरी है। कॉर्पोरेट युग का बर्बर और आदमखोर पूंजीवादी शोषण वनों, जैव विविधता और वन्य जीवों का विनाश, पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को बर्बाद और आदिवासी सभ्यता व संस्कृति की तबाह कर रहा है। वह समूचे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करके अपने मुनाफे को बढ़ाना चाहता है। इसके चलते आदिवासियों का जीवन अस्तित्व खतरे में है।

उक्त विचार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव संजय पराते ने मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के पाक्षिक लोकजतन द्वारा फेसबुक पर आयोजित एक व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। यह व्याख्यानमाला मप्र माकपा के पूर्व सचिव शैलेन्द्र शैली की स्मृति में हर वर्ष 24 जुलाई से 7 अगस्त तक आयोजित किया जाता है।

पराते इस वैचारिक आयोजन के 7वें दिन *”अबूझमाड़ से खोंगपाल तक अस्तित्व के संकट से जूझते आदिवासी“* विषय पर बोल रहे थे। इस आभासीय मंच पर 10000 से ज्यादा लोगों ने उनके व्याख्यान को सुना।

उन्होंने कहा कि जिस प्रदेश में 75% परिवारों की औसत मासिक आय 5000 रुपयों से कम हो और जहां औसतन 65 रुपये दैनिक मजदूरी के साथ सबसे सस्ते मजदूर मिलते हो, उस प्रदेश में सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े आदिवासी समुदाय की आर्थिक स्थिति और इस पर टिके मानव विकास सूचकांक की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। यही कारण है कि पूरे प्रदेश के लिए कुपोषण की दर 38% होने के बावजूद आदिवासी समुदायों की दो-तिहाई महिलाएं और बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित है।

स्पष्ट है कि उन्हें न्यूनतम पोषण आहार 2200 कैलोरी तक उपलब्ध नहीं है। उन्होंने कहा कि राज्य में स्वास्थ्य बीमा योजना पूरी तरह फ्लॉप है और स्वास्थ्य क्षेत्र के निजीकरण के कारण होने वाली लूट से हर साल 10 लाख लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं और इनमें अधिकांश आदिवासी होते हैं।

माकपा नेता ने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास के नाम पर जिन परियोजनाओं को थोपा गया है, उससे आदिवासियों के हिस्से में केवल विस्थापन और विनाश ही आया है। पिछले 40 सालों में छत्तीसगढ़ में लगभग 2 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया है और 2 लाख हेक्टेयर वन भूमि का गैर-वानिकी कार्यों के लिए।

वनों पर 70% परियोजनाएं खनिज खनन की है। इस प्रकार, औसत भूमिधारिता को ध्यान में रखें, तो 4 लाख हेक्टेयर भूमि से 10 लाख आदिवासी और गरीब किसान परिवारों का विस्थापन तो हुआ है, लेकिन उनका पुनर्वास नहीं।

उन्होंने कहा कि कॉर्पोरेटों को मुनाफ़ा कमाने का मौका देने के लिए ही वनाधिकार कानून, पेसा और 5वीं अनुसूची के प्रावधानों को धता बताते हुए डिब्बे में बंद बोधघाट परियोजना को बाहर निकाला गया है और सिचाई के फर्जी आंकड़ों को गढ़कर आदिवासियों की सहमति हासिल करने की कोशिश हो रही है। यदि यह परियोजना अमल में आती है, तो कॉरपोरेटों की तिजोरी में तो 3 लाख करोड़ आएंगे, लेकिन 42 गांवों के 35000 आदिवासियों के हिस्से में बर्बादी। इसी प्रकार पोलावरम परियोजना से 25000 से ज्यादा आदिवासी उजड़ेंगे और दोरला जनजाति ही विलुप्ति के कगार पर पहुंच जाएगी।

पराते ने कहा कि भाजपा राज ने जिस सलवा जुडूम अभियान को प्रायोजित किया था, उसका स्पष्ट मकसद था कि कॉरपोरेटों को यहां की प्राकृतिक संपदा को लूटने का मौका दिया जाए। इसके लिए दसियों गांवों में आग लगाकर 700 गांव खाली करवाये गए और हजारों लोगों को कथित शिविरों में कैद कर लिया गया।

नक्सलियों के नाम पर आज भी निर्दोष आदिवासियों की हत्याएं की जा रही हैं और उनको जेलों में ठूंसा जा रहा है। आदिवासी क्षेत्रों में कॉर्पोरेट लूट के लिए सरकारें भी उनके साथ में है। इसलिए आप आदिवासियों के साथ खड़े हो सकते है या फिर उनके खिलाफ कार्पोरेटों के साथ। बीच का कोई रास्ता नहीं है और कांग्रेस-भाजपा की सरकारों ने आदिवासियों के खिलाफ और कार्पोरेटों के साथ खड़ा होना तय किया है। यही कारण है कि बोधघाट मामले में भी वे एक हैं।

उन्होंने कहा कि देश के 115 सबसे पिछड़े जिलों में छत्तीसगढ़ 7 आदिवासीबहुल जिलों सहित 10 जिले शामिल हैं। उर्जाधानी कोरबा का भी सबसे पिछड़ा होना चौंकाता है। केंद्र और राज्य सरकारों की जो आदिवासी विरोधी और नव-उदारवादी नीतियां हैं, उसका दुष्परिणाम है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार उनकी जनसंख्या में सवा प्रतिशत की गिरावट आई है और भील, कोरकू, परजा, सहरिया, सौर और सोंर जैसी जनजातियां विलुप्ति की कगार पर है। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले वर्ष वनाधिकार से वंचित आदिवासियों की बेदखली का जो आदेश दिया है, वह इस संकट को और बढ़ाता है। इससे हमारे प्रदेश के 12 लाख आदिवासी परिवार प्रभावित होंगे।

प्रदेश में फैल रहे कोरोना महामारी पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि राज्य में अभी तक जितने टेस्ट हुए हैं, उसमें 3% लोग संक्रमित पाए गए हैं। इस प्रकार 7-8 लोग संक्रमित होंगे और निश्चित ही इसमें एक बहुत बड़ी आबादी आदिवासियों की भी है।

आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की जो हालत है, उसमें सामान्य बीमारी भी महामारी का रूप ले लेती है और महामारी से होने वाली मौतों को भी सामान्य मौतों में गिना जाता है। इस बात का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलेगा कि कितने कोरोना संक्रमित इन क्षेत्रों में रोज मर रहे होंगे। यह एक दुखद स्थिति है।

उन्होंने कहा कि आदिवासियों के पास नगद धन-दौलत नहीं है और वे पूंजीवादी बाजार के लिए किसी काम के नहीं है, क्योंकि वे उनका मुनाफा नहीं बढ़ा सकते। लेकिन उनके पास जो प्राकृतिक संपदा है, उसको लूटकर कॉर्पोरेट अपनी तिजोरियां जरूर भर सकते हैं। इसलिए उनकी सभ्यता, संस्कृति और उनके समूचे जीवन अस्तित्व को मिटाकर वे उनके प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना चाहते हैं।

इस लूट के खिलाफ सभी शोषित-उत्पीड़ित-दमित लोगों को संगठित करके, एक शोषण विहीन – जाति विहीन समाज की स्थापना में यकीन रखने वाले लोगों की अगुआई में ही इस लड़ाई को लड़ा जा सकता है।

वामपंथी आंदोलन की यही दिशा है, जो हमारे देश, संविधान और आदिवासियों के जीवन अस्तित्व की रक्षा कर सकती है और इस देश में मनुवाद के रूप में फासीवाद लादने की हिंदुत्ववादी ताकतों के कुचक्र को विफल कर सकती है।

इस समाचार के पाठक पूरे व्याख्यान को इस लिंक पर देख सकते हैं : https://www.facebook.com/Lokjatan/videos/1691232174363879/