छत्तीसगढ़

कार्तिक पुन्नी मेला विशेष

“कार्तिक पुन्नी मेला”

होमेन्द्र देशमुख📝


पुन्नी के मेला में जातेन दुकेल्ला अऊ कर लेतेन गंगा इसनान,
ले लेतेंन केला चढ़ा लेतेंन भेला मना लेतेंन भोला भगवान..

यूं तो छत्तीसगढ़ के कुछ जगहों पर मेला भाईदूज या मातर के दिन से ही शुरू हो जाता है लेकिन छत्तीसगढ़ में मेला मड़ई के असल सीजन शुरुआत कार्तिक पूर्णिमा के ही मेले से होती है ।
छत्तीसगढ़ में यह परंपरा न जाने कब से है लेकिन धार्मिक स्थलों ,नदियों के आसपास लगने वाले ये मेले धान के नई और अच्छी फसल के दर्शन और अच्छे दिनों की वापसी या शुरुआत के उत्सवों के रूप में भी जाना जाता है । कृषि प्रधान भू भाग होने के कारण सम्भवतः इन दिनों ही मेला मड़ई को ज्यादा मनाया गया होगा । इसी समय किसान और खेती के मजदूर के हाथों में पैसा आता है ।

बरसात के बाद नदी रास्ते खुलते हैं ,दीवाली की सफाई के बाद गली घर साफ सुथरे होते हैं और हर व्यक्ति का मन उल्लासित प्रफुल्लित होता है । ईश्वर का ध्यान दर्शन तीर्थ भी हम सुख और खुशी में ज्यादा करते हैं ।

पंजाब में बैसाखी , केरल में ओणम आदि कई वड़े क्षेत्रीय त्योहार नई फसलों और प्रतीकों के कारण ही होते हैं ।

लगातार एक महीने अलसुबह कार्तिक स्नान के बाद कार्तिक पूर्णिमा पर आसपास महत्व के धार्मिक जगहों ,सरोवर ,नदी नालों के संगम पर कार्तिक मेला लगता है । छत्तीसगढ़ में मेला मड़ई क्षेत्र के खरीदारी ,मनोरंजन ,पर्यटन और धार्मिक महत्व का उत्सव तो होता ही है । पर मेला मड़ाई युवा वर्ग के लिये भी बहुत बड़ा आकर्षण और आसपास के हमउम्र युवाओं के देखने मिलने का भी एक माध्यम होता है ।

छत्तीसगढ़ के कई पारंपरिक गीतों में प्रणय प्रसंगों के वर्णन में मेला मड़ई और हाट बाजार का जिक्र होता आया है । कई गीतों में ऐसे आयोजनों का बड़ा ही श्रृंगारिक वर्णन मिलता है । सज संवर कर जाना ,पान खाना ,झूला झूलना और लौटते समय नई मन मे नई यादें और नए सपनों से भरे नयन लेकर लौटना मेले का शग़ल रहा है ।

मुझे याद है एक मेले में सन 1980 में जब 9 साल की उम्र में था और मुझे जेब खर्च को मिले 25 पैसों में से 10 पैसे का चना चटपटी और 15 पैसे का बंगला पान खाया था ।

मेरे गांव के पास नाले के किनारे बावा देवता के पुन्नी मेला में केवल उसी दिन ही जाना होता था । जबकि वह गांव के करीब ही था ।

मेला मड़ई छत्तीसगढ़ की संस्कृति की परंपरा है । हम जाते आते रहें तो यह परंपरा बनी रहेगी ।
आप भी आसपास के मेलों में जरूर जाइये ,बच्चों को भी ले जाइए ताकि वह भी कह सकें हम भी बचपन मे क्या क्या देखे ।

क्योंकि,

दया मया के नइये ठिकाना …

दया मया के नइये ठिकाना
लहर गंगा ले लेतेंन जोड़ी
लहरगंगा ले लेतेंन ना…
ये दे जिनगी के नइये ठिकाना
लहर गंगा ले लेतेंन जोड़ी
लहरगंगा ले लेतेंन ना

आज बस इतना ही…!

(लेखक न्यूज़ चैनल में सीनियर वीडियो जर्नलिस्ट हैं)

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