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चलो फेर हरेली मनावव,खुशी-खुशी सब हरेली मनावव

झवेन्द्र भूषण वैष्णव✍️

एसो के हरेली सुहावत नई हे,
गुड़हा चिला ह‌ लिलावत नई हे।
बितत हे बिन बरसा के सावन ,
धरती माता ह अघावत नई हे ।
एसो के हरेली सुहावत नई हे।

बिन बीयासी के नागर धोवागे,
सुक्खा खेती संग जिंदगी सुखागे।
हरियर धनहा ह पियर पड़गे,
चिंता फीकर म जांगर अतरगे।
रहि,रहि पीरा मिटावत नई हे,
एसो के हरेली सुहावत नई हे।

रुच,रुच गेंडी़अऊ नोनी के खो,खो,
लईकाके छुवऊला अऊ बबा के हो हो।
मोर मन‌ चिंता भुलावत नई हे,
भेला भर नरियर फेकावत नई हे ।
एसो के हरेली सुहावत नई हे।
गुड़हा चिला ह‌ लिलावत नई हे।

माता के अछरा म मया भरे हे,
कतरो पीरा ल वही हरे हे।
बेरा सरकही अऊ दुख बिसराही,
खेती खार ह फेर हरियाही।
चिंता फीकर ल तीर लगावव,
चलो फेर हरेली मनावव।
खुशी-खुशी सब हरेली मनावव

(रचनाकार छत्तीसगढ़ प्रगतिशील किसान संगठन के महासचिव हैं)

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