राजनीति

प्रधानमंत्री पर अभद्र भाषा का प्रयोग करना कांग्रेस की मानसिकता बन गई है – किरण देव

लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के दुष्प्रचार के बाद भी मोदी तीसरी बार बने प्रधानमंत्री

रायपुर (खबरवारियर) भाजपा प्रदेशाध्यक्ष किरण देव ने बिहार में चल रही ‘मतदाता अधिकार यात्रा’ को लेकर कहा कि देश के सर्वाेच्च पद पर बैठे हुए और बड़ी पारदर्शिता के साथ इन 11 वर्षों में भारत और भारत के नागरिकों का सम्मान बढ़ाने वाले नेता के बारे में कुछ अभद्र टिप्पणी करेंगे तो उसका प्रतिफल तो मिलेगा। उन्होंने कहा कि देश की जनता कांग्रेस के कृत्यों को भलिभांति समझती है।

एक जनसभा में कांग्रेस के नेता प्रधानमंत्री मोदी और उनकी माता के बारे में अभद्र भाषा का प्रयोग करते है और कांग्रेसियों को लगता है कि जनता खुश होगी?

जब जब कांग्रेसियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर अमर्यादित भाषा का प्रयोग किया है तब तब जनता का आशीर्वाद मोदी जी को मिला है।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष श्री देव ने कहा कि पहले भी कांग्रेस और इंडी गठबंधन के दल इस तरह की अभद्र भाषा और झूठ बोलकर भ्रम फैलाते रहे हैं। लोकसभा चुनाव में भी विपक्ष ने ‘मोदी आ जाएंगे तो आरक्षण खत्म कर देंगे, संविधान में परिवर्तन कर देंगे‘ कहकर दुष्प्रचार किया, पर क्या हुआ?

नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने। उन्होंने कहा कि कांग्रेस समेत विपधी दलों का तो किसी भी संवैधानिक संस्थाओं पर विश्वास नहीं है। वे किसी के ऊपर विश्वास नहीं करते। उनको यह लगता है कि वह जो भी झूठ परोसेंगे, जनता उसको सही मान लेगी, तो यह हिंदुस्तान में संभव नहीं है।

गुजरात के चुनाव में भी प्रधानमंत्री मोदी के प्रति किस तरीके से कांग्रेस ने अभद्र भाषा का प्रयोग किया। यह तो मर्यादाविहीन राजनीति है और राजनीति की स्वस्थ परंपरा नहीं है। इस तरह की भाषा किसी भी चुनाव में कांग्रेस व विपक्ष के अनुकूल वातावरण बनाने में कारगर साबित नहीं होगा।

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष देव ने केन्द्रीय गृह मंत्री का सिर काटकर मेज पर रखने वाले बयान को लेकर हुई एफआईआर के मद्देनजर ‘बेवकूफों को मुहावरों की भाषा समझ नहीं आती’ कहे जाने पर एक सवाल के जवाब में कहा कि यही तो भाषा की मर्यादा की बात हम कह रहे हैं। यह स्वस्थ परम्परा नहीं है। आप चिढ़ और जलन की वजह से तृणमूल कांग्रेस ने कुछ सकारात्मक काम नहीं किया।

पश्चिम बंगाल की क्या दुर्दशा करके रखी है? और, इसके बाद भी आज यह कैसे सोचा जा सकता है कि इस भाषा को जनता स्वीकार कर लेगी?

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