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खौफ़ की बरसी …आलेख: होमेन्द्र देशमुख

खौफ़ की बरसी …!

होमेन्द्र देशमुख, भोपाल📝


6, श्यामला हिल्स भोपाल, यानि ‘मुख्यमंत्री निवास’ , 20 मार्च 2020 को दोपहर 1 बजे तक 120 गज दूर खड़े पत्रकारों को प्रेस कांफ्रेंस के बुलावे का इंतजार था ।
लगभग डेढ़ बजे वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह की गाड़ी अंदर गई ,पीछे पीछे सीएसपी बिट्टू शर्मा की गाड़ी आई और पत्रकारों के जमघट के पास रुकी । बोलेरो का शीशा खोल उन्होंने मुझे पास आने का इशारा किया । मैं अंदर बुलावे के सन्देश की आस में उनकी ओर तत्काल लपक गया ।

इन्होंने धीरे धीरे सभी मीडियाकर्मियों को ले कर गेट पर पहुचने का मुझे निर्देश तो दिया लेकिन साथ में मुझे तुरन्त अपनी गाड़ी से दूर हट जाने को कहते हुए डॉक्टर्स के उपयोग करने वाली एक सेनेटाइजर का बॉटल निकाल मेरे हाथ पर उड़ेल दिया । और मुझे कोरोना के लिए एलर्ट किया ।
कोरोना के प्रति इतनी गम्भीरता और सजगता की यह मेरे साथ पहली बड़ी घटना थी ।
मैं थोड़ा डर गया ,और साथ मे समझ भी गया कि मामला या उससे खतरा बहुत बढ़ चुका है ।

पिछले 17 दिन से जारी मप्र में सत्ता पलट की बड़ी राजनैतिक उठापटक और ड्रामे का खात्मा हुआ और इसी दिन मुख्यमंत्री कमलनाथ की अंतिम प्रेस कांफ्रेंस हुई और उन्होंने इस्तीफा दे दिया । पत्रकारों की उस भीड़ में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने और गिने चुने मास्क लगाए लोगों में मैं भी था ।

राजनीतिक घटनाक्रम की इस ऐतिहासिक घटना अभी और ऐतिहासिक होना बाकी था

मुख्यमंत्री कमलनाथ के इस अंतिम प्रेस कांफ्रेंस में शामिल ऐसे पत्रकार मित्र जिनकी सुपुत्री को इस के ठीक तीन दिन बाद यानि जनता कर्फ्यू वाले दिन और खुद उन पत्रकार महोदय को इसके पांचवे दिन कोरोना पॉजीटिव पाया गया । तब से मेरे जैसे कई मीडियाकर्मी साथी अपने घरों में ,कमरों में बंद(क्वेरेंटाइन) हो गए ।

कोरोना अब बहुत बड़ा ‘ख़ौफ़’ बन चुका था ।
हमारा सब काम छोड़कर क्वेरेंटाइन हो जाना कोई विडंबना नही, न कैद था और न ही कामचोरी थी। वह हमारी बड़ी जिम्मेदारी थी। सबका अपना अपना फर्ज था और ‘संयम से नियंत्रण ‘ । यही तब सबसे बड़ी देश सेवा थी । इस खतरनाक वाइरस से समाज ,खुद और परिवार को बचाए रखने का यही सबसे अच्छा रास्ता था जो वैसे,आज भी है ।

दो दिन पहले तक जिस प्रेस कांफ्रेंस में मुख्यमंत्री का इस्तीफ़ा बड़ी खबर थी वही अब पत्रकार महोदय के पुत्री के कोरोना पॉजिटिव होने की वह खबर उससे भी बड़ी हो गई ।

क्योंकि हाल ही में विदेश से लौटी उस युवती के पत्रकार पिता 20 मार्च को उसी प्रेस कांफ्रेंस में हम लोगों से अनजाने में घुल मिल चुके थे । यह खबर भारत के राष्ट्रीय चैनलों की हैडलाइन बन गई थी उसी के बाद..,

मुझे भी, मेरे ही घर के अलग कमरे में कैद होकर रहने का निर्णय लेना पड़ा । तब किसी को तो कुछ फर्क नही पड़ा ,पर मेरी पत्नी ने अपनी चिंता छुपाकर, होंठों पर झूठी मुस्कान लाते ,कमरे के दरवाजे से लग कर पूछीं – क्या उनसे आप भी मिले थे ?

उनको पता ही था कि मेरा जवाब हां ही होगा । और वह ‘हां’ सुन गईं , झेल गईं । देश भर में काढ़ा पीने की सलाहें शुरू हो चुकी थी, पर पत्नी ने पूछा -चाय पियोगे या वह भी बंद…!
और मेरे अलग रहने के इंतज़ाम में जुट गईं ।

अगर यही, किसी पत्नि के साथ होता तो पति खीझ उठता,चिल्ला पड़ता, बरदाश्त के बाहर हो जाता- “तुम्हें क्या जरूरत.. थी भीड़ में घुसने की.. मास्क.. नही लगा सकते थे..बंद कर के घर बैठ जाओ ..ऐसा काम..” आदि आदि ।
सभी नही , तो हम अधिकतर पुरुषों का यही रवैया होता ।

कौन से पाप किये थे जो मीडियावाला मिला…! घर कब आओगे , गाड़ी धीरे चलाना, प्रेस कांफ्रेंस में खाना खाकर भरा टिफ़िन वापस मत लाना, इस रविवार घर पर रह पाओगे या नही, कूलर कब साफ करोगे ?

जैसे सवालों और सुझावों के शब्दों का तो जैसे संसार होता है, पत्रकार की पत्नी के पास । जब हम पर मुसीबत आती है तब अपने माथे पर वो शिकन भी छुपा लेती है । यह सोचकर कि पति का मनोबल कम न पड़ जाय । चाहे मौका इस तरह कमरे में बंद होने का भी क्यों न आ जाए । हालांकि यह अब तक की सबसे बड़ी त्रासदी थी ,देश का भी ,पति का और पत्नि का भी।

3 मार्च 2020 को मप्र से कुछ कांग्रेसी विधायकों की गुप्त गुड़गांव यात्रा का खुलासा 5 मार्च तक हो चुका था ।

एक मंत्री के हाथों अपने ही पार्टी के विधायकों के सूटकेस खींचते वीडियो के साथ मप्र में कांग्रेस सरकार के कथित तख्ता पलट की खबरों से देश के अखबार और टीवी चैनल्स पर चल पड़ीं थीं ।

भोपाल में हम अभी कोरोना को ‘दिल्ली अभी दूर है’ के तर्ज पर महज दिल्ली एयरपोर्ट और कुछ अंतराष्ट्रीय हवाई अड्डों से जुड़ी शहरों की बीमारी मान कर ज्यादा गम्भीर नही थे । सप्ताह भर सत्ता बदलाव में केंद्र तो बैंगलोर गुड़गांव और दिल्ली रहा पर इधर भोपाल में भी हम लगातार होते राजनैतिक मुलाकातों ,घटनाओं उठापटक को नजदीक से कवर करते रहे । 10 मार्च आते आते कुछ क्षेत्रीय भाषायी चैनल सहित सभी राष्ट्रीय चैनलों की टीमें बैंगलोर अहमदाबाद मुंबई और दिल्ली से आने लगीं । खुद मीडिया के वीडियो जर्नलिस्ट (कैमरामैन) होने के कारण , साथ काम कर रहे , दिल्ली से आए एक दूसरे चैनल के पत्रकार को मैंने दस मार्च को मास्क लगाए देखा।

पहली फुर्सत मिलते ही इसी दिन मैं भी एक मास्क खरीद लाया । दो तीन दिन और किसी को लगाते नही देखा तो मैंने भी अपना ‘डर’ पोस्टपोंड कर दिया । लेकिन मैंने किसी से भी हाथ मिलाना बंद कर दिया । केवल नमस्कार ! थोड़ा आपसी दूरी की सावधानी बनाने की कोशिश शुरू कर दी ।

12 मार्च 2020 को ‘कोरोना‘ को COVID19 नाम से WHO ने वैश्विक महामारी घोषित कर दिया गया । लगातार मास्क लगाए लोगों के चेहरे देखते और देश भर से आ रही कोरोना के बढ़ते केस की खबरें मुझे डराते नही बल्कि हर पल सावधान कर रहे थे । मामला उतना आसान नही था जितना अखबार और टीवी पर दिखते थे ।

समझदार मीडिया इस फैलते महामारी की खबरें देने में संयम बरत रहे थे ,ताकि लोग पैनिक न हो जाएं । और हम सावधानियों को ‘डर-किनार’ (दरकिनार) करते जाते हैं । क्योंकि हम समझते हैं कि हम उन डरपोकों में नही जो मास्क लगाए घूम रहे हैं ।

कभी श्यामला हिल्स में सीएम हाउस के बाहर, कभी लिंक रोड में शिवराज चौहान हाऊस, कभी बीजेपी और कभी कांग्रेस कार्यालय , विधानसभा , होटलें और एयरपोर्ट ।

सब जगह भीड़ और तेजी से संक्रमण या वाहक बनने का खतरा । कई बार हाथ मिलाने के बजाय नमस्कार करने पर मेरा मजाक भी उड़ा । पर मुझे क्या..!

लगातार , तेज होती भीड़भाड़ वाली राजनैतिक गतिविधियों में दिल्ली मुंबई से आए लोगों के बीच मीडिया कवरेज के कारण मैंने लगभग 15 मार्च से ही घर मे अपना कमरा और बिस्तर अलग कर लिया । काम से वापस घर जाकर पहने हुए कपड़े अलग रखना । फिर बाद में उसे रोज खुद साफ करना ,आदत बन गई थी ।पड़ोसियों के घर भी आना जाना ,मिलना बंद ।

खैर, एक दिन बाद सेनेटाइजर खरीद कर गाड़ी में रख लिया । पर, बड़े कंजूसी भी करते रहे । मास्क और सेनेटाइजर सील बंद शोभा बढ़ा रहे थे ।

मैंने 18 मार्च 2020 को कोरोना के कसते शिकंजे को भांप लिया था । उस दिन दिल्ली के स्टोर में राशन लेने वालों की भीड़ उमड़ गई थी । सब को सब्र रखने की सलाह दी जा रही थी । मैं गर्मियों में कम खराब होने के कारण दो महीनों का ग्रोसरी एक साथ लेता हूँ । पर मप्र में तख्त पलट की उन दिनों चल रहे राजनैतिक हंगामे, गतिविधियों और मेरे अनियमित दिनचर्या के कारण 18 मार्च तक चालू महीने का राशन किराना नही ला पा रहा था ।

19 मार्च को कोरोना का बढ़ता ख़ौफ़ देख कर पत्नि को फील्ड से ही फोन किया और किसी भी हालात में अकेले स्टोर जाकर महीने- दो महीने का राशन का समान एक साथ ले आने को कहा । कैसे जाऊं, कितना लाऊं ,नगद लाऊं कि कार्ड मँगाउँ …?

इन सब सवालों के लिए मेरी डांट सुनकर झल्लाते हुए आखिर ओला से ऑटो ले ,दो महीने का सामान उसी दिन शाम तक ले ही आईं थीं । पर मैं उसी दिन ही हड़बड़ी में इसे ले आने का कारण उन्हें नही समझा पाया था ।

कोई पैनिक फैलाना मेरा मकसद नही था । सो ,जब घर लौटा तो वह , वही बमुश्किल 40 दिन के गिने चुने सामान के साथ थीं । पूछने पर भोलेपन से कहा – आधा से ज्यादा मार्च निकल चुका है तो एक मई को फिर ले लेंगे ।

मैं चुपके से घर से फिर निकला और कुछ दूध पावडर के पैकेट और टिशू पेपर के साथ पांच किलो के राइस का पैकेट लेकर और आ गया । हम छत्तीसगढ़ियों को चावल के बिना खाने की थाली अधूरी लगती है ।
थैंक गॉड ..!

‘रसोई’ की जरूरतों की अब मुझे चिंता थी न ही पत्नि को । वैसे भी थाली बजाने का काम हम पतियों का ज्यादा होता है और वो आपको कभी खाली पेट नही सोने देंगी ।

19 मार्च को मुख्यमंत्री कमलनाथ के निवास पहुँचते- पहुँचते आखिर सेनेटाइजर का बोतल खोल ही लिया । लगा इतने बड़े आदमी को हमारी वजह से कोई खतरा नही होना चाहिए ।

वापस आते ही मेरे वरिष्ठ ब्रजेश जी ने मुझे एक मास्क दिया जो उनके किसी शुभचिंतक ने भेजा था । मैंने वह ‘मास्क’ तुरंत पहन लिया । वही मेरे ‘मास्क’ पहनने का पहला दिन था ।
सेल्फ डिस्टेन्स और सेल्फ अवेर्नेस, डर नही ! डर की जीत है ,पर अवेर्नेस और सावधानी ही इस महामारी का बचाव है यह पूरी तरह इस दिन तक समझ मे आ चुका था ।

20 मार्च 2020 की उस प्रेस कांफ्रेंस और बदले हालात के बाद , मेरे उस सेल्फ क्वेरेंटाइन की पहली रात एक बजे तक आईफोन के नोट में लिखे सारी डायरी पर नजर डालते रहा । कब कहाँ किससे मिले क्या सावधानी बरते, कितने समय और कब और किसने मेरे सामने छींक मारी..
जी..!

पिछले 19 मार्च से मेरी निजी और सार्वजनिक गतिविधियों का मेरे फोन पर लेखा जोखा था । सब सुरक्षित जानकर हम लात तान सो गए । बमुश्किल एक नींद सोया ही था कि रात लगभग तीन बजे ही फिर आंख खुल गई ,एक शंका मन मे आई और फोन के नोट्स को फिर चेक करने लगा। क्या पता मुख्यमंत्री निवास के उस प्रसिद्ध पत्रकार-वार्ता में कहीं उन संक्रमित पत्रकार और महामारी के भोपाल से दूसरे पीड़ित से कहीं भीड़ में टकरा ही गए हों ।

थोड़ी ठंड सी लगने लगी , गला चुभने सा लगा । सांस फूलने सी लगी ..! थर्मामीटर मांगने पत्नी को जगाया , 98.4 डिग्री .. धत्त तेरे की सारा मन का वहम था । पत्नी ने डांटा देख नही रहे बाहर बारिश हो रही .. एक चादर और ले लो और चुपचाप सो जाओ ..!

देर सुबह कानों में आवाज गूंजी ..चाय बनाऊं या और सोओगे ..?

चाय पी , योगा किया और क्वेरेन्टाइन के बाद पहली सुबह पर एक भारी दिन चढ़ने लगा । दोपहर तीन बजे फिर बारिश शुरू हो गई और फिर चुपके से थर्मामीटर दबा कर बैठ गए । अब तो माप 94.7 डिग्री था ।

शाम की चाय के बाद मोबाइल के किसी प्रवचन में ‘डर’ के भूत की कहानी सुनी और शायद उस दिन मेरे मन से वह डर का भूत भी भाग गया ..!

‘मन’ मजबूत कर संकल्प लिया कि असल मे हमें उसी ‘डर’ से जीतना है ।
कहते हैं 1920 में भी महामारी फैली थी तब भी इसी डर ने लोगों को ज्यादा मारा था । महामारियों में यह डर और खौफ़ बड़ा नकारात्मक परिणाम देता है , शब्द ही ऐसा है ।

दिन महीने और अब साल बीत गए , उस ‘ख़ौफ़’ का दूसरा बरस शुरू होने को है । इस बीच कोरोना का मरीज हो जाने के बाद भी मन से उसका ख़ौफ़ कहीं गया नही ।

साल भर पहले उसी दिन से कई दिनों, महीनों के लिए ‘कैद हो गए हम’ और बहुत लोग कमरे में , घरों में और शहरों में ..! बड़ा नौकरी करते होंगे , हजारों की चाहे तनखा लाते होंगे ,घर और परिवार चलाने का, और तो और सरकार चलाने का दावा भी करते होंगे, पर उस दिन से घरों में ऐसे दुबके और निकले भी तो ऐसे दुबक दुबक कर निकले कि आज जब उस खौफ की बरसी आ गई तब वह डर झिझक और डर कभी कभी जेहन में आ ही जाता है ।

एक साल बाद भी तब जब कि देश मे नाइट सोशल डिस्टेन्स, दुकानों के बाहर गोल घेरा, नाइट कर्फ्यू और lockdown किये जा रहे , भोपाल में सूनी सड़कें और बाजार बंद दिख जाए तो सहसा वही मंजर और बाहर निकलने का अपराध बोध फिर याद आ जाता है ।

आज बस इतना ही..!

(लेखक होमेन्द्र देशमुख न्यूज़ चैनल में सीनियर वीडियो जर्नलिस्ट हैं)

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