राजस्थान राज्य विधुत निगम लिमिटेड एवं अडानी कम्पनी की प्रस्तावित परसा कोल खनन परियोजना के लिए ग्रामसभा का फर्जी प्रस्ताव बनाकर हासिल की गई वन स्वीकृति निरस्त कर दोषियों पर हो कार्यवाही – CBA

खनन कंपनियों के लिए रमन सरकार द्वारा किए गए सभी गैरकानूनी कार्यों पर पर्दा डालते हुए उन्हें क़ानूनी मान्यता देने की कोशिश कर रही है भूपेश सरकार
रायपुर(khabar warrior)- सरगुजा के हसदेव अरण्य क्षेत्र में स्थित परसा कोल ब्लाक जिसे राजस्थान राज्य विधुत निगम को वर्ष 2015 में मोदी सरकार ने आवंटित किया एवं उसके विकास और खनन का ठेका (MDO) अडानी कम्पनी को मिला हुआ है, इसकी 614. 219 हेक्टेयर वन भूमि के व्यपवर्तन के लिए वन स्वीकृति प्राप्त करने जिला कलेक्टर ने वर्ष 2018 में वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया की समाप्ति एवं प्रभावित ग्रामसभाओ की सहमती के संवंध में फर्जी प्रमाण पत्र जारी किया है.
ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री, राज्यपाल और अन्य संवंधित मंत्रालयों को पत्र लिखकर इसकी शिकायत करते हुए तत्काल वन स्वीकृति निरस्त करने की मांग की. छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन इस मामले की तत्काल उच्च स्तरीय समिति से जाँच, परियोजना को दी गई स्टेज 1 की वन स्वीकृति को निरस्त करते हुए दोषियों पर कार्यवाही की मांग करता हैं. कार्यवाही नही होने पर व्यापक आन्दोलन शुरू किया जायेगा. मुख्यमंत्री को प्रेषित अपने आवेदन में ग्रामीणों ने कहा है कि-
कलेक्टर द्वारा जारी किया गया यह प्रमाण पत्र ग्रामसभाओ के फर्जी प्रस्ताव बनाकर जारी किया गया है. परसा कोल ब्लाक हेतु वन भूमि के व्यपवर्तन या खनन की सहमती के लिए हमारे गाँव की ग्रामसभा ने किसी भी प्रकार की स्वीकृति नही दी है . कलेक्टर द्वारा जारी किए गए पत्र के अनुसार दर्शाई गई ग्रामसभा का आयोजन कभी भी हमारे गाँव में हुआ ही नही है.
ग्रामीणों ने आरोप लगाते हुए कहा है कि कलेक्टर के प्रमाण पत्र कहा कि प्रस्तावित वन भूमि पर वनाधिकारों के चिन्हांकन और निर्धारण की प्रक्रिया पूर्ण कर ली गई है जबकि उक्त वन भूमि पर आज भी हमारे वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया लंबित है . वर्ष 2016 – 17 के लंबित और वर्ष 2020 में जमा नए व्यक्तिगत वनाधिकार के दावों के सत्यापन और मान्यता की कार्यवाही चल रही है जो अभी भी जारी है. हमारे गाँव के सामुदायिक वन संसाधन के अधिकारों की भी आज दिनांक तक मान्यता नही दी गई है. अतः कलेक्टर द्वारा वनाधिकार कानून की मान्यता की प्रक्रिया की समाप्ति की घोषणा पूर्ण रूप से गलत जानकारी है और ग्रामसभा ने अभी तक इसके पूर्ण होने की घोषणा नही की हैं.
छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन का मानना हैं कि पूर्व रमन सरकार के 15 वर्षो के कार्यकाल में बस्तर से लेकर सरगुजा तक ग्रामसभाओ के फर्जी प्रस्ताव स्वयं जिला प्रशासन द्वारा तैयार करवाए गए एवं उन्ही के आधार पर खनन हेतु वन स्वीकृति एवं भूमि अधिग्रहण की कार्यवाहियां की गई और आदिवासियों को उनके जंगल जमीन से बेदखल किया गया. वर्तमान भूपेश बघेल सरकार इन मामलो की निष्पक्ष जाँच और कार्यवाही करने से न सिर्फ बच रही है बल्कि उन गैरकानूनी कार्यो को क़ानूनी मान्यता देकर खनन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं.
बस्तर के बैलाडीला 13 नंबर डिपोजिट की वन स्वीकृति के लिए ग्रामसभा के फर्जी प्रस्ताव की जाँच रिपोर्ट में कलेक्टर ने न सिर्फ पूरी प्रक्रिया को शून्य माना, बल्कि परियोजना के लिए जारी वन स्वीकृति के अंतिम आदेश जिसे राज्य सरकार जारी करती हे, को निरस्त करने की अनुशंसा की l वाबजूद इसके एक वर्ष बाद भी राज्य सरकार ने कलेक्टर के प्रतिवेदन पर कार्यवाही करने के बजाए पिछले दिनों प्रेस विज्ञप्ति जारी कर उस खनन परियोजना को शुरू करने की मंशा जाहिर की जो बस्तर के आदिवासियो के विश्वास पर एक कुठाराघात है.
हसदेव अरण्य क्षेत्र के खनन प्रभावित ग्रामवासी पिछले एक दशक से खनन परियोजनाओं के खिलाफ आन्दोलनरत हैं. वर्ष 2014 से कई बार ग्रामसभाओ ने खनन परियोजनाओ के प्रत्येक चरण का विरोध कर केंद्र व राज्य सरकार को अवगत कराया लेकिन कोई संज्ञान लिए बिना ही प्रक्रियाओं को आगे बढाया जा रहा हैं जबकि यह सम्पूर्ण पांचवी अनुसूचित क्षेत्र है.



