क्या ‘खलीफा राज’ भारतीय मुसलमानों के लिए सही विकल्प है ?

अंतराष्ट्रीय(खबर वारियर )- इस्लामी शासन चलाने के लिए ‘खलीफ़ा राज’ की व्यवस्था का सिद्धांत बहुत लुभावना है। इसमें निहित बाते लोगों को खासतौर पर दुनिया भर के मुसलमानों को अपनी ओर खींचती है और लोग इसे अपनाने के लिए आतुर रहते हैं। कुछ मुस्लिम बाहुल्य मुल्क जो अपने कानूनों को इस्लामी शरियत द्वारा चलाते हैं खुद को ‘इस्लामिक लोकतंत्र’ कहलाना पसंद करते हैं। इन मुल्कों में इस्लामी-कानून जहाँ सामाजिक मसलों को सुलझाने में सहायता प्रदान करते हैं, वहीं वे राजनैतिक मसलों को भी सुलझाने में सहायक होते हैं।
किन्तु इन्होंने ज्यादातर आधुनिक उदारवादी मूल्यों को भी इस्लामी मूल्यों में समाहित कर लिया है। जब सन 2013 में अल-कायदा के एक संगठन आईएसआईएस ने ‘इस्लामी राज’ की स्थापना का ऐलान किया, उसी वक्त से मुसलमानों की ‘खलीफा-राज’ स्थापित करने की इच्छा में बदलाव आया है। भारतीय संदर्भ में, यह हमेशा दावा किया गया कि यहाँ के मुस्लिम नागरिक एक इस्लामी राज’ की स्थापना की इच्छा रखते हैं और वे सीमाओं से परे जाकर अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाने के सिद्धांत पर चलने के लिए प्रेरित रहते हैं। बहरहाल, इसके विपरीत पूरी दुनिया के मुसलमान इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण मसलों जैसे ‘इस्लामोफोबिया’ और सामाजिक तौर पर दूसरों को अलग करने के बढ़ते चलन से ग्रस्त हैं।
इसी तरह भारत में मुसलमान जहाँ अपनी लगातार बढ़ती गरीबी और उनकी पहचान को प्रभावित करने वाले सामाजिक-कलंक से जूझ रहे हैं, वहीं से इस बात से भी वाकिफ हैं कि आधुनिक शासन व्यवस्था’ की सीमाओं को देखते हुए ‘खलीफा-राज जैसी परिवर्तनशील पहचान की कल्पना करना मुर्खतापूर्ण व निष्फल प्रयास है। इसके अलावा उनका मजहब भी उन्हें उस मुल्क के कानूनों की पालन करने की सीख देता है जिसके वे नागरिक हैं। यह गौर करने की बात है कि 100 से भी कम भारतीय मुसलमानों को आईएसआईएस जैसे संगठन इस काल्पनिक इस्लामी राज की स्थापना के लिए अपनी ओर आकर्षित कर सका।
भारतीय मुसलमान जिम्मेदार नागरिक हैं जो अपनी भारतीय पहचान, संवैधानिक मूल्यों और यहाँ के बहुलवादी सांस्कृतिक मूल्यों का आनंद उठा रहे हैं। वे अच्छी तरह से इस सच्चाई को जानते हैं कि उन्हें निरंतर उपजती चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए एक ‘उदारवादी रवैया अपनाने की जरूरत है। इसके अलावा हमारा संवैधानिक दायरा, जिसे मानने के लिए प्रत्येक मुसलमान बाध्य है, अपनी राष्ट्रीय सीमाओं का उल्लंघन करने और मुल्क विरोधी गतिविधियों में संलिप्त रहने की अनुमति नहीं देता। भारतीय मुसलमानों ने हमेशा ही ऐसी किसी भी गतिविधि में पड़ने से गुरेज किया है जिसके कारण उन्हें सुरक्षा संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ा हो व जिसका सीधा-सा असर उनके समुदाय व मुल्क पर पड़ता है।
‘खलीफा-राज’ स्थापित करने की अवधारणा उन्हीं संगठनों द्वारा पोषित की जाती रही है जो किसी कानून को नहीं मानते व जो अमन चैन व मानवता के खिलाफ है। इस्लाम अपने साथ अमन का पाठ लेकर आया है जिस पर पूरी दुनिया के मुसलमान कायम हैं और इसे बढ़ाने में सदा अपना योगदान देते रहे हैं। इसीलिए जो कोई मानता है कि भारतीय मुसलमान खलीफा-राज की इच्छा रखते हैं, वे दिशा से भटके हुए हैं। इनकी सोच का आधार तर्क नहीं बल्कि उनकी अज्ञानता और पक्षपातपूर्ण रवैया है।



