गाथा अलौकिक गरुड़ स्तंभ की: योगी बस्तरिया की कलम से

“अलौकिक गरुड़ स्तंभ”
योगी बस्तरिया✍️
दंतेवाडा शक्तिपीठ दक्षिण बस्तर धन वैभव और शिल्पकला के नमूने इधर-उधर बिखरे हैं… बस्तर का इतिहास रहस्यों का खजाना है… जिसके बारे में विरले ही जानने की कोशिश की है, कुछ इतिहासकारों ने इसके बारे में जानने और लिखने की कोशिश लेकिन बहुत कुछ आज भी राज ही हैं…
बस्तर में कई राज वंश हुए हैं…. जिसमे कुछ राजवंश (नल, गंग और नाग वंश) रचनाशील, निर्माणशील रहे और कुछ वंश न्यून निर्माणशील रहे… लेकिन उन्होंने पुरातात्विक धरोहरों के संरक्षण करने का बीड़ा उठाया और इसे पूरा करने का प्रयास भी किए…
ऐसा माना जाता है की 13 वीं शताब्दी के शुरुआत में काकतिया वंश ने बारसुर के पास क्षेत्रों के पुरातात्विक अवशेषों को जीर्ण-शीर्ण अवस्था से उठाकर संरक्षित करना आरम्भ किया… 1908 में पंडित केदारनाथ ठाकुर द्वारा लिखी किताब “बस्तर भूषण” के पृष्ठ क्रमांक 105 (नवकार प्रकाशन) में उन्होंने लिखा है कि… बारसुर के नारायण गुडी से गरुड़ स्तंभ उखाडकर दंतेवाडा के माई दंतेश्वरी मंदिर में रखा गया है…
तो आप जो यह छायाचित्र देख रहे है, क्या यह गरुड़ स्तंभ उसी बारसुर स्थित नारायण गुडी का है, जो अद्यतन दंतेवाडा शक्ति पीठ परिसर में माई जी की गुडी के ठीक सामने है….

पंडित ठाकुर जी ने अपनी किताब में बारसुर के नारायणगुडी की व्याख्या की है… क्या आप इसके बारे मे कुछ जानते हैं? उन्होंने बताया की इसी गुडी के ठीक सामने से गरुड़ स्तंभ निकालकर दंतेवाडा लेजाकर प्रतिस्थापित किया गया… उन्होंने यह जानकारी तो दी पर दंतेवाडा के उस मंदिर के बारे में नहीं बताए… लेकिन, फागुन मंडई के बहुत से विधि विधान वह के नारायण मंदिर के सामने होते हैं पर वहां तो कोई ऐसा गरुड़ स्तंभ नहीं…
ऐसा गरुड़ स्तंभ शक्तिपीठ में माई जी के गुडी के ठीक सामने शोभायमान है… तो क्या यह वही गरुड़ स्तंभ है जो बारसुर के नारायणगुडी से निकालकर लाया गया है?
इस किंवदंती से जुड़ी झलकियां एक बुजूर्ग दादा बताते हैं कि… लगभग 13वीं शताब्दी के पहले बारसुर को गढ़ने के लिए वारंगल से कारीगरों ने गरुड स्तंभ बनाए थे… आज अपने गौरवशाली इतिहास को माई जी की गुडी के ठीक सामने खड़ा है… साथ ही उन्होंने बताएं कि पूरे भारत में गरुड़ स्तंभ सिर्फ दो मंदिर के गुड़ी में गरुड स्तंभ खड़ा है… एक गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर में और दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी माई के गुड़ी में…
बात को जारी रखते हुए बुढ़े बाबा ने बताया कि हमारे पुरखों से पीढ़ी दर पीढ़ी यह जानकारी मिली है कि… इस खंभ को बैलगाड़ी और कांधों से ढोकर लाया गया था… और गरुड़ स्तंभ जितना जमीन के ऊपर दिखाई दे रहा है उससे ज्यादा नीचे गड़ा है… साथ ही बताया कि इस गरुड़ स्तंभ की अलौकिक खायित यह है… जहां यह स्तंभ जहां भी होता है वहां तंत्र साधना का केन्द्र होता है… जिन मंदिरों में गरुड़ स्तंभ होता है वहां शैव पूजा प्रतिबंध होती है… वहां तामसिक पूजा होती है जैसे पशुओं की बलि देते हैं….
मना जाए तो यह तंत्र विद्या साधना का केन्द्र हैं… और प्रचिन काल से यहां के पुजारी क्षत्रिय है। पुजारी जिया परिवार से हैं जो हजारों साल से माई की पूजा करते आ रहे हैं जो मुख्य पुजारी हैं…
अब आप अनुमान लगाइए इतना बड़ा सिंगल पत्थर का लाट बिना किसी लॉरी, डम्फर, क्रेन, जेसीबी के यह सिर्फ बैलगाड़ी और कंधों के दम से लाया गया और बाकायदा लगाया भी गया…
कुकुरमुत्ते जैसे खुलते इंजीनियरिंग कॉलेजों के दौर में ऐसी नक्काशी देख कर बड़े से बड़े इंटीरियर डिज़ाइनरों का सांस फूल जाती है…

आस्था : शक्तिपीठ के प्रांगण में स्थित यह स्तंभ हर श्रद्धालु के आस्था का एक अटूट प्रतिक है… ऐसा माना जाता है जो कोई भी श्रद्धालु हाथ उलटे करके इस स्तंभ की परिधि को एक ही बार में छू लेता है वो पुण्यात्मा कहलाता है…



