आस्था की जड़ को संभाले हुए हैं झिरका पहाड़ी के मूषक वाहक

@योगी बस्तरिया✍️


 

मान्यता है कई गांवों की रक्षा करते हैं चर्तुभुज, बप्पा के दर्शन करने जान जोखिम में डालकर पहुंचते हैं लोग, नक्सलियों के कब्जे में है पूरा इलाका और खूंखार जानवर से घिरा है झारालावा की पहाड़ी”

बस्तर में बिखरे कुछ देवी-देवातओं से परिचित है, बहुत कुछ कालखण्डों को अभी जानना बाकी है… बस्तर की पुरानी शाख से पूछो की जीना कितना मुश्किल है… नए पत्ते तो बस अपनी अदाकारी में रहते हैं।बस समझ लीजिए यह सृष्टि का चक्र है और इस चक्र से बस्तर के पहाड़ियों में बिखरे सभी पाषण को अभी गुमनामी से और गुजरना है..

ऐसे ही झारालावा पहाड़ी में शताब्दियों से विराजे वक्त के थपेड़ों से घिसते दन्तेश की कशिश भी अजीब है, इन्हें देखते-देखते कोई भी इनके वक़्त में चला जाए और सोचता है ये जब बना होगा, तो चमकता कैसे रहा होगा,तब कितने लोग इन में जीते रहे होंगे। शायद वक्त की आंधी में घिसता लंबोदर उन सभी लोगों को भी निहारता होगा जो मनौती मांगने नीचे गांव से पगडंडी पर नंगे पांव कदम नापते कठिनाइयों से जूझ कर झिरका डोंगरी तक पहुंच कर सुमरते रहे होंगे।

लगभग 10वीं से 11वीं शताब्दी से विराजे गणपति को हमें अपने पूर्वजों की विरासत की उसकी महानता पुनः लौटाने की जरूरत है जो आज दक्षिण बस्तर का इतिहास के पन्ने धूल-मिट्टी से दबकर कई पहाड़ियों पर पड़ा है.कई गुमनाम पहाड़ी ऐसी भी हैं जहां हमारे पुर्वज शताब्दियों पहले पत्थर पर छाप छोड़े होंगे जो आज भी अपने अतीत को छुपाए गुमसुम हैं….

ये वही दन्तेवाड़ा है जहां बारसूर का गजानन विश्व में सबसे बड़े होने का दावा करता है… तो ढोलकल के 3 हजार फीट की ऊंची पहाड़ी पर शांत स्वरूप से विराजे गणपति अपनी अमिट गौरव बिखरता दिखाई देता है… तो इधर, नक्सली मांद और कई जंगली जानवरों से घिरे बिहड़ झारालावा गांव के झिरका पहाड़ी के वीरान गांव पर लगभग 10वीं से 11वीं शताब्दी के गणाध्यक्ष एक पेड़ के नीचे विराजमान है।

वक्त के थपेड़ों से बूढ़े हो चुके काले ग्रेनाइट के झुर्रियों में झलकती खूबसूरती से ही इनका यौवन को निहार सकते हैं… लगभग 5 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी काले ग्रेनाइट से बनी मंगलमूर्ति की यह प्रतिमा बेहद आकर्षित के साथ मूषक पर सवार हैं,ढोलकल की पहाड़ी पर विराजे गणपति की प्रतिमा की तरह छिंदक राजाओं की कलाकृति झलकती हैं…

मन में यह सवाल जरूर उठता है कि ऐसे बिहड़ और फिसलन पहड़ के ऊपर इस प्रतिमा को किसने स्थापित किया होगा और इनके स्थापना के पीछे की कहानी क्या होगी। फिलहाल इसके बारे में कोई जानकारी किसी के पास नहीं… लेकिन धुरली और भांसी के लोगों की मान्यता इससे जुड़ी हुई है,वे कहते हैं कि साल में एक-दो बार हम यहां जाकर पूजा अर्चना करते हैं। साथ ही इस ऐतिहासिक प्रतिमा के पीछे कई किवदंतियां भी जुड़ी हुई हैं,कइयों का मानना है कि सदियों पहले पूर्वजों ने स्थापित किए श्री गणेश हमारी रक्षा के साथ हमारी सभी मनोकामना पूरी करते हैं…

बताते हैं कि बस्तर के राजा का भी इस गणेश के प्रति बड़ी आस्था थी। जब भी वे जंगल में शिकार के लिए जाते तो गणेश जी के दर्शन कर शिकार किया करते थे।

काले ग्रेनाइट से बने हैं एकदंत

दंतेवाड़ा जिले की झिरका की पहाड़ी पर लगभग 10वीं से 11वीं शताब्दी के काले ग्रेनाइट से बने गणेश जी लगभग 5 फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी काले ग्रेनाइट के एक चट्टान को गढ़कर मूषक पर सवार हैं।

इस प्रतिमा में छिंदक राजाओं की कलाकृति झलकती साफ झलकती है,मंगलमूर्ति के झिरका की खड़ी पहाड़ी की चढ़ाई से ही मुश्किल सफर की शुरुआत होती है। 5 से 7 किमी की फिसलन भरी पहाड़ी पर जान जोखिम में डाल कर चढ़ना होता है.।पहाड़ के ऊपरी छोर में पहुंचने के बाद दूसरी दिशा की पहाड़ी की ओर लगभग 3-4 किलो मीटर वापस उतरना होता है,लम्बी दूरी तय करने के बाद खाई से पहले खुले आसमान में एक पेड़ नीचे गणेश जी की प्रतिमा स्थापित है।

जंगली जानवर के साथ नक्सलियों का है खौफ

यह इलाका पूरी तरह से बीहड़ है। ग्रामीण बताते हैं कि जिस जगह विघ्नहर्ता विराजमान है।उस जगह को बोल चाल की भाषा में वीरान गांव कहते हैं। यह इलाका पूरी तरह से नक्सलियों के कब्जे में है।साथ ही भालू, तेंदुए के साथ कई हिंसक जानवरों का बसेरा भी है। इस कारण इस डोंगरी पर पहुंचने के लिए हिम्मत जुटानी होती है… जिस इलाके में प्रतिमा स्थापित है, वहां तक पहुंचने के लिए काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है… तब जाकर बप्पा के दर्शन होते हैं… धुरली और भांसी के ग्रामीण के अलावा आज तक यहां कोई बाहरी दर्शनार्थी दिखाई नहीं दिया हैं…

ऐसे पहुंच सकते हैं..

दंतेवाड़ा जिला मुख्यालय से बचेली मार्ग पर 18-19 किलोमीटर पर धुरली गांव तक पहुंच सकते हैं… धुरली और भांसी गांव के बीच से एक कच्ची सड़क से पुजारी पारा से किरंदुल से विशाखापट्टनम रेलवे ट्रैक को पार करने के बाद झारालावा (झिरका) की पहाड़ी तक पैदल पहुंच सकते हैं… सबसे पहले झिरका की खड़ी पहाड़ी को लगभग 5 से 7 किमी की फिसलन भरी पहाड़ी पर चढ़ना होता है… ऊपरी छोर तक पहुंचने के बाद लगभग 3 किमी दूसरी दिशा के दूसरी पहाड़ी में उतरना होता है…

(लेखक दैनिक समाचार पत्र में ग्राफिक्स डिज़ाइनर हैं)