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तीजन बाई : महिला पंडवानी युग की शुरुआत का अंत 

बोरे बासी की स्वयं थीं ब्रांड एंबेसेडर

सीनियर जर्नलिस्ट होमेन्द्र देशमुख के फेसबुक वाल  से ✍️

 

तीजन बाई : महिला पंडवानी युग की शुरुआत का अंत 

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‘बोरे बासी की स्वयं थीं ब्रांड एंबेसेडर’

तीजन बाई मेरे पड़ोस के गांव में भैरा शिकारी से ब्याही थीं। शिकारी छत्तीसगढ़ में एक घुमंतू समुदाय है जिनका पारंपरिक व्यवसाय छिंद (खजूर ) की झाड़ू चटाई बनाकर,मुर्गी पालन, जंगली चिड़ियों जैसे तीतर बटेर का शिकार कर भोजन और जीविकोपार्जन होता है।
बाद में हमारे समाज के टोला निवासी तुलसी राम देशमुख से भी उनका शायद ब्याह हुआ।

दुर्ग बालोद मार्ग के चंदखुरी में उनके बचपन के दिन थे। उनके पिता दाऊ लोगों के खेत से छींद और दातुन, अक्सी से तोड़ते। दाऊ लोग उसके पिता का टंगिया बनकी और अकसी नौकरों से छिनवा देते। उनके पिता कभी कभी अपना सामान छुड़ाने तीजन बाई को किसान दाऊ के घर भेज देते। तीजन बड़े दुलार से अकसी वापस मांग लातीं।

दाऊ परिवार की महिलाएं बच्ची समझ कर दया भाव से उन्हें उनके सामान दिलवा देती। असल में बालिका तीजन को बचपन से भजन कीर्तन में लगन थी। वो कभी जयद्रथ वध प्रसंग तो कभी कोई भजन सुना देती।

तीजन बाई का ननिहाल पाटन ब्लॉक में था उनके नाना केवल तंबूरा से स्थानीय रूप में पंडवानी गाते थे । बालिका तीजन उनकी नकल कर पंडवानी गाने का अभ्यास करती थी।चंदखुरी में दाऊ भूषण लाल हरमुख के खेत मे अपने परिवार की अन्य महिलाओं के साथ वो भी काम मे चली जाती थी वहीं वो काम करते पंडवानी गाती थी।दाऊ जी उनकी प्रतिभा को देख सार्वजनिक मंच में पंडवानी गाने के लिए उसे न केवल प्रोत्साहित किया। बहुत न नुकुर के बाद हिम्मत दिखाई और पहला मंचन चंदखुरी में ही करवाया गया।

चंदखुरी के वरिष्ठ समाज सेवी शंकराचार्य स्वरूपानंद के शिष्य श्री नरसिंह चंद्राकर जी बताते हैं कि
एक दिन उनके पिता से कह कर कुर्मी सियान, दाऊजी ने अपने चौरा में चिमनी के अंजोर में बिना तंबूरा के पंडवानी सुना। यही तीजन बाई का पहला पंडवानी मंचन था। चंद्राकर और देशमुख परिवार के ये सियान कुल पांच रुपया का बक्शीश दिए। और इस प्रोत्साहन से उनके पंडवानी गायन का कारवां चल निकला।

उनके आगे की कहानी और उनके पति की कहानी कभी और..

बंधुओं यह कहानी पहली बार मेरे द्वारा लिखी और कही जा रही है।
सत्यता जानने के लिए आप ग्राम चंदखुरी के किसी अति बुजुर्ग से भी जांच कर सकते हैं।

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गुरुदेव क़ृषि केंद्र
Gurudev krishi kendra

चलते चलते..

SECL के बिलासपुर मुख्यालय में परितोष चक्रवर्ती थे। थे वो बंगाली और बंगाली होने के नाते मैं क्या सभी लोग उन्हें दादा कहते थे।

SECL मुख्यालय जिसके अंदर सात ओपनकास्ट और एक सूरजपुर का अंडरग्राउंड कोल माइंस के मुख्यालय बिलासपुर में थे तो एजीएम , पब्लिक रिलेशन लेकिन थे कला के पारखी और कद्रदान। छत्तीसगढ़ के विभिन्न कला माध्यमों का वे हर साल एक महोत्सव करवाते। सरकार का पैसा, कलाकारों को मेहनताना और जनता का मनोरंजन।
पुराने पुराने कलाकारों को ढूंढ कर मंच पर पुनः लाने की कोशिश करते।

मंच के बीच में कैमरा लगवाते और एक एक कार्यक्रम को रिकॉर्ड करवाते। आज उनके पास सबसे बड़ा संकलन होगा यदि किसी के पास है। मैं उनके साथ लगभग चार साल इस प्रोजेक्ट पर करीब से पहले , अटेंडेंट तो आगे कैमरामैन के रूप में भी काम किया।

मेरे पास पैसा कैमरा और संसाधन निजी नही थे मैने उनको ऐसे बड़े कलाकारों के निजी जीवन को मंच के अलावा घर और उनके गांव जाकर भी संकलित करने का आग्रह किया। और मैने इसकी शुरुआत तीजन बाई से करने का आग्रह किया। वो मान भी गए और कहा कि यह काम तुम ही करो लेकिन मैं उन्ही दिनों मुंबई और वहीं से वापस आकर भोपाल शिफ्ट हो गया और उनसे सतत संपर्क से दूर हो गया। बात आई गई हो गई और मैं भी आपनी आजीविका के जद्दोजहद में लग गया जो आज पर्यंत जारी है।

तीजन बाई की भोपाल के भारत भवन में अंतिम प्रस्तुति शायद 27 जनवरी 2023 को हुई । मित्र कलाकार रंग निर्देशक धन्नू सिन्हा ने बताया।
लेकिन 12 मई 2022 को भोपाल के कुशाभाऊ कन्वेक्शन सेंटर में देश भर के अलग अलग क्षेत्र के एक्सीलेंस व्यक्तित्व का सम्मान था , उसी दिन उनसे मेरी मुलाकात हुई। इसके दूसरे दिन उनसे आखिरी बार मिला था।

होटल सयाजी हैरिटेज में अपने कमरे में नाश्ता में बासी का इंतजार कर रही थीं और सुबह सुबह चावल को कैसे अकेले नाश्ते में परोसें यह होटल वालों का संकट था।

मैने कुछ समझा और वेटर को समझाया तुम एक प्लेट केवल सादा चावल, पीने वाला पानी और नमक कटोरी में सादा नमक ला दो बाकी वो खुद कर लेंगीं और इस तरह उनका नाश्ता बल्कि ब्रंच हुआ।
टूर के दौरान यही उनका नाश्ता या खाना, फिर दिन भर फुर्सत..!

उनसे मेरी लंबी बातें हुई और गनियारी आकर उनके कुछ इंटरव्यूज निजी जिंदगी पर करने की योजना भी बनी थी लेकिन यहां से लौटते ही कुछ दिनों में वो गंभीर बीमार हो गईं बात टलती गई। और आज वे खुद इस नश्वर संसार के मंच से विदा लेकर अगली प्रस्तुति तक चली गईं।
वो फिर आएंगी ऐसा मेरा निजी मत है।

चित्र, जब मैं उनसे आखिरी बार भोपाल में मिला था उसी दिन का। लेकिन मैने यह चित्र खींचा था, कुछ फोटो अभी ढूंढना बाकी है।

बात मेरे पड़ोस में ब्याही तीजन बाई और उनके पति भैरा शिकारी की कभी किसी और प्रसंग पर…

आज बस इतना ही..!

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(लेखक नेशनल टीवी न्यूज़ चैनल मेँ सीनियर वीडियो जर्नलिस्ट हैँ )

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