विचार

स्मृति शेष ..और सांस के साथ थम गई गेड़ी की टाप!

✍️योगी बस्तरिया की कलम से,

उत्सव के आगोश में ठहरकर कलाओं की चहक-महक में मन रमता है, तो जीवन, प्रकृति और संस्कृति की आपसदारी के अनेक अर्थ खुलते हैं… हाल ही में “लोकरंग” के आंगन में “गमक उठे मादल और थिरकते गेड़ी के पांव थम गया”… महीने भर पहले साजों की लय-ताल पर नाचती देह आदिम उल्लास के साथ नच रही थी…

मैं बात कर रहा हूं… तस्वीर के साथ सभी के दिलों में मौजूद ज़िंदादिल व्यक्तित्व के धनी दुर्ग जिले के नेवई निवासी सुभाष सिंह बेलचंदन (गुरुजी) उर्फ बबलू का… बालोद जिले में डौंडीलोहारा के चिलमगोटा (रेंगाडबरी) स्कूल में मेरी इनसे मुलाक़ात तब हुई। बस्तर की आदिम संस्कृति को बचाने जज्बा लिए स्कूल-स्कूल घूम रहे राजेन्द्र आर्ची जी के साथ। राजेन्द्र आर्ची जी ऐसे शिक्षक है जिन्हें ने अपनी सारी जिंदगी बस्तर के लोककला और संस्कृति सहजने के लिए समर्पित कर दिए।

राजेन्द्र आर्ची जी का बस्तर के किसी भी जिले में तबादला होता तो वें स्कूल में बस्तर संस्कृति का बीज सृजन कर ही आते… दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी माई के मंदिर के प्रांगण से लेकर गर्भगृह तक से पेंटिंग और संरक्षण का अहम योगदान राजेन्द्र आर्ची का है। बस्तर संस्कृति और धरोहर पर उन्होंने कई किताबें लिखी हैं… आज वे नरहरपुर ब्लाक के आमाडूला स्कूल में शिक्षक हैं।

मैं लौट आता हूं, डौंडीलोहारा के वनांचल गांव चिलमगोटा (रेंगाडबरी) के शासकीय प्राथमिक शाला में…

दोपहर का वक्त था, सहायक शिक्षक सुभाष सिंह बेलचंदन अपने स्कूली लोकनृत्य दल के साथ कलात्मकता की शिखर को छूने के लिए गेड़ी दल का मचान बना रहे थे…

मांदर की लय और गेड़ी की टाप के साथ एक दूसरे के गेड़ी और कंधों को पाकर लोक संस्कृति का मचान बनना इतना भी आसान नहीं होता, जितना हम देखते है, सैकडों बार साधने के बाद ही इस हुनर को मजबूती मिलती है…

राजेन्द्र आर्ची जी इसमें माहिर हैं, उन्होंने कहा सुभाष “मचान के लिए एक साइज के बच्चों को घेरे के नीचे रखो और घेरा छोटा नहीं बड़ा होना चाहिए… और दुबले बच्चों को ऊपर रखो, मचान 3 लेयर में खत्म करो”। मैं दूर बैठकर चुप देखते रहा और सुभाष जिद नहीं छोड़ा जब तक मचान बना नहीं लिया… सूरज भी थक कर सुभाष से टिका गया था, सुभाष की लग्नता और जूनन ने मुझे चंद पलों में इन्होंने मुझे अपना बना लिया…

कई साल के बाद छात्तीसगढ़ क्रांति सेना के प्रमुख सेनानी अमित बघेल ने भिलाई में हरेली तिहार में शामिल होने की जिद किए… बेमन से गया जरूर था, जब वहां सुभाष के गेड़ी दल को बस्तरिया परिधान से मस्ती में आते देखा।

दूसरे नृत्य दल के युवा नाच कर थक गए थे पर इनके जोश में कमी दिखायी नहीं दी… सच में उस दिन शहर की सड़कें भी खुशी से झूम रहा था, क्योंकि गेड़ी का हर टाप सड़क पर गोंडवाना की महक छोड़े जा रहा था…

सुभाष 37 वर्ष की उम्र तक बस्तरिया गेड़ी लोकनृत्य के प्रदर्शन के लिए ये विश्व भर के आधा दर्जन से अधिक देशों के साथ हजार मंचों पर गेड़ी नृत्य और लोकगीतों की यात्रा कर चुके थे।

कहते है, साज और शरीर की यह आपसदारी, दरअसल जीवन और संगीत के अनटूटे आदिम रिश्ते की गवाह भी है। यह सिर्फ जनजातीय जीवन और परिवेश तक सिमटी रहने वाली वास्तविकता नहीं है, यह एक सच है, जो किसी भी मनुष्य की चेतना में उठने वाली हिलोर है…

02 जून की सुबह ऐसा समाचार मिला गेड़ी नृत्य को भूगोल या समुदाय की सीमाओं से लांघने वाले सुभाष सिंह बेलचंदन सब छोड़ कर कभी न लौट आने वाले अंनत यात्रा पर निकल चुके थे। ये नींव के ईंट थे, गोंड़वाना संस्कृति की इमारत के… छात्तीसगढ़ का कोई भी ऐसा नृत्य नहीं जो मांदर की थाप से लोकगीत के साथ नृत्य जीवन को महकाता न हो।

गेड़ी” नृत्य को ही लें… थाप और तान पर थिरकते उल्लास उस रात सांस के साथ गेड़ी की टाप भी थम गई…

अलविदा…
सुभाष सिंह बेलचंदन (गुरुजी)

वनांचल गेड़ी नृत्य सांस्कृतिक संस्था के संस्थापक, निदेशक एवं शासकीय प्राथमिक शाला चिलमगोटा (रेंगाडबरी, डौंडीलोहारा, जिला बालोद)

 

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