“बूंदों की बारात”

होमेन्द्र देशमुख :🖊️🖊️

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बूंद‘ बताओ कहां चली
किसकी प्यास बुझाने
किसको चली भिगाने
किस को गीत सुनाने
किस-किस को बहलाने
किस-किस को फुसलाने
क्या-क्या खेल दिखाने निकली
तुम बन-ठन कर आज…
बूंदों की बारात – बूंदों की बारात

हमने सुनी कहानी तेरी
आसमान पर घिरी-घनेरी
बरसी जब धरती पर मन से
सरिता में धारा बन-बन कर
मिलने चली तू सागर से री
फिर, बदरा बन जाती हो तुम
सूरज का ले ताप…
बूंदों की बारात – बूंदों की बारात ।

वन आच्छादित बेल-लताएं
सबको जीवन लाती तुम
कतरा-कतरा ओस सुमन पर
पत्ता-पत्ता नाची तुम
देते रहे तुम्हे आमन्त्रण
उस पर रहम न खाती तुम
डाली-डाली बहा ले चली
कीट-पतंग , मोहताज़…
बूंदों की बारात – बूंदों की बारात ।

कौन तुम्हारे प्यारे हैं ,
तुम भी किसके प्यारे हो
रहे ‘पपीहा‘ प्यासे तुम बिन
आते..कैसे जो पुकारे हों
दिलबर की तुम प्यास बुझाते
कैसे दिल के हारे हो
पढ़-सुन लेती कौन सी भाषा
या समझ लेती हो जज़्बात…
बूंदों की बारात – बूंदों की बारात

आती है छम-छम कर सावन
बजे घुंघरुओं का सा आंगन
भीगे मौसम भीगा आंचल
सुलग-सुलग जाए फिर क्यूं मन
देख बहारें छाई यौवन
कर सोलह श्रृंगार…
बूंदों की बारात – बूंदों की बारात ।

जब तुम जो ना आते साथी
पथिकों के कौन प्यास बुझाती
प्यासी धरती प्यासा जीवन
प्यासे खेत कहां उपजे अन्न
रीता कृषक हो भूखा जन-जन
पंख फैला कर मोर नाचता
क्या ‘प्यासा‘ ही पपीहा मर जाता
सूरज-ताप कौन सह पाता
अंत मनुष – पशु जात…
बूंदों की बारात – बूंदों की बारात

पिछली बार कहां तुम आए
सब का जीवन तुम तरसाए
अब के बरसना सब के अंगना
महल, हवेली, टाट का बंधना
निर्धन -धनी भेद न करना
प्रेमी आए मिलन को, रुकना
घड़ी दो घड़ी दे, सपने बुनना
जम के बरसना ज्यों ही प्रियतम
जाने की करे बात…
‘ बूंदों की बारात- बूंदों की बारात ।।’

आज बस इतना ही..!