अक्टुबर में लव-कुश एकता का खुला जंगी प्रदर्शन चारो दिशाओं से होता हुआ पटना के गाँधी मैदान में दिखेगा

नेशनल डेस्क(खबर वारियर)- बिहार में अन्य पिछड़ी वर्ग में आने वाली कुर्मी जाति की आबादी अच्छी खासी है हलांकि उनकी आबादी को लेकर प्रचारित किया जाता है कि 2-3 % है ,जो पूर्णतः गलत है। कुर्मी समाज का दावा दो अंकों का है लेकिन वह लगभग एक दर्जन उपजाति जैसे अवधिया ‘ घमैला, चंदेल, समसवार, कोचैसा, यादि में बटा हुआ है लेकिन बदलते सामाजिक और राजनीतिक हालातों ने उनमें बहुत तेजी से जागरुकता आई है और अब वे एक दुसरे से शादी व्याह के बन्धनों में भी बंधने लगे है।
कुर्मी परम्परागत कृषक जाति है परन्तु अपने बुद्धि विवेक और मेहनत के बल पर अब बिहार की अग्रनी जातियों में सामिल हो चुका है और कुछ मामले में तो सवर्ण जातियों को भी पीछे छोड चुका है। बिहार का कुर्मी समाज का नेतृत्व की खुबी यह है कि वह बदलते हालातों का सामना करने के लिए अपने आपसी मतभेदें को भुलाकर कोयरी, कुशवाहा समाज के साथ स्वभाविक लव कुश समीकरण बनाकर बिहार की राजनीतिक और सामाजिक समीकरणों को नई दिशा देने की ओर बढ चुका है जिसका खुला प्रदर्शन अक्टुबर 2021 में प्रदेश की सभी दिशाओं से होते हुए पटना की सडकों और गाँधी मैदान में दिखेगा |
सन्1994 के कुर्मी चेतना रैली, गाँधी मैंदान (पटना) के संयोजक सतीश कुमार (बाद में नालंदा के अस्थावां से भी विधायक बने) का नेतृत्व और उन का व उनके साथियों के बहुत बडे योगदान को भुलाया नहीं जा सकता हैं। लेकिन कालांतर में उन्हें नीतीश कुमार ने ही किनारे लगाने में कोई कसर शेष नही रखा क्योंकि वे घमैला कुर्मी हैं और नीतीश अवघिया है। उन्हें हमेशा डर रहता है कि घमैला कुर्मी के किसी व्यक्ति को अवसर मिल गया तो नालन्दा पर उनका वर्चस्व समाप्त हो जावेगा क्योंकि नालन्दा जिले की मात्र एक ब्लाक में ही अवधिया कुर्मी की आवादी है जबकि घमैला कुर्मी की घनी आवादी बिहार शरीफ के चारो तरफ लगभग 70 किलों मीटर की रेडियस में है ।
नीतीश कुमार ने यही कार्य चंदेल कुर्मियों के लिए भी किया है जिनकी घनी आवादी भबुआ और भागलपुर के इलाके में है। नीतीश कुर्मी जाति के सतीश कुमार सहित लगभग एक दर्जन से अधिक प्रतिभावान नेताओं को अज्ञातवास में भेजने का गुनाह किया है जिसके कारण बिहार के कुर्मी समाज के लोग उन पर विश्वास करना छोड़ दिया, नहीं तो आज बिहार में नीतीश कुमार नहीं सतीश कुमार जैसे आघा दर्जन से अधिक नेता प्रदेश की राजनीति में प्रमुख भूमिका में होते!
सिर्फ सतीश कुमार की ही बात नहीं है। खुद नीतीश कुमार का उत्तर बिहार के कुर्मी बाहुल्य क्षेत्रों पर कोई ध्यान ही नहीं रहता है। यही कारण है कि वृषिण पटेल के बाद उत्तर बिहार में कोई कुर्मी नेता उभरकर समाज के पटल नहीं आया है। सच यह भी है कि नीतीश कुमार खुद के सामने किसी कुर्मी जाति के दूसरे व्यक्ति को नेता बनकर लोकप्रिय होने देना नहीं चाहते हैं, ऐसे रूकावट और स्वार्थपूर्ण राजनीति कुर्मी समाज के विकास और मजबूती के लिए बहुत घातक साबित हो रहा है।
नीतीश कुमार से ज्यादा लोकप्रिय कुर्मी नेता सतीश कुमार थे। सतीश कुमार को जब राजनीति से किनारे लगाने की कोशिश की जा रही थी तो बिहार के कुर्मियों ने “सतीश कुमार नहीं तो नीतीश कुमार भी नहीं” का नारा भी दिया था लेकिन कुर्मियों तथा राज्य की व्यापक हितों का ध्यान करके इस अभियान को बंद कर दिया गया था ।
तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद बिहार के 99% कुर्मी जाति के लोगों समेत कुशवाहा व अति पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक तथा शिक्षित समझदार सवर्ण जाति के लोगों ने नीतीश कुमार के समतावादी सोच, सभी जातियों, धर्मों, वर्गों के लोगों को साथ लेकर चलने की दुरदर्शी सोच के कारण भरोसा किया और बिहार की सत्ता पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ नवंबर 2005 में नीतीश कुमार जी को सौंप दी। जिस पर खरा उतरने के साथ ही नीतीश कुमार ने अपने पहले कार्यकाल (2005-2010) में बिहार के काया पलट कर दिया।
पिछले 15 वर्षों के कार्यकाल में से पहला कार्यकाल नीतीश कुमार का बिहार के विकास और मजबूती के लिए बहुत ही स्वर्णिम कार्यकाल रहा है। बाकी के दोनों कार्यकाल ( 2010-2015, 2015-2020) औसत कार्यकाल ही रहा है। बाद के दोनों कार्यकाल में नीतीश वह तत्परता नहीं दिखा पाये जो उन्होंने अपने प्रथम कार्यकाल (2005-2010) में दिखाई थी।
नीतीश के लिए राहत की बात यह रही कि उनके द्वारा लगातार कुर्मी जाति की उपेक्षा/नजरअंदाज किये जाने के बावजूद जनता दल से 4 सांसदों के साथ 1994 में जनता दल(जाॅर्ज) जो बाद में समता पार्टी बना तक और बाद में समता पार्टी का जनता दल यूनाइटेड में विलय होने से 2020 के बिहार विधान सभा चुनाव होने तक बिहार के 99% कुर्मी के सभी शाखाओं और उपजातियों ने समर्थन देकर उनके हाथ को मजबूत बनाये रखने की कोशिश की है।
हालांकि इसकी कीमत भी बिहार के कूर्मि समाज के लोगों को यादव जाति, सवर्ण जाति व अन्य संगठित जातियों द्वारा शिकार बनकर चुकानी पडी़। एक तरह से कह सकते हैं कि नीतीश कुमार के बिहार के मुख्यमंत्री बनाने में बिहार के कूर्मि समाज के लोगों का बहुत बड़ा बलिदान और त्याग है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उत्तर प्रदेश ,मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ और क्षारखण्ड में यही काम क्यों नहीं किये जा सकते हैं? इस विषय पर वर्तमान में विचार विमर्श करने की आवश्यकता है। खुद को जातिवाद से दूर रखकर नीतीश कुमार जी ने जो बिहार के विकास और मजबूती के लिए काम किये हैं उनके यही गुण/कार्यशैली बिहार के कुर्मी समाज के लोगों के लिए कायल करने वाले हैं! जिसके लिए बिहार समेत देश दुनियां में बसे कुर्मी समाज के लोग खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं।
नीतीश राजनीति के ऐसे स्तम्भ हैं जो बात नहीं काम पर विश्वास करते हैं, बड़बोलापन और दिखावा से तो मिलों दुर रहते हुए सादा जीवन उच्च विचार रखते हैं। पिछले करीब 45 वर्षों के राजनैतिक जीवन में नीतीश कुमार पर कोई दाग नहीं लगा है। यही सब सोच-विचार कर बिहार के कुर्मी समाज के लोग नीतीश कुमार पर आंख बंद करके भरोसा करते हैं और उन्हें बिहार के मुख्यमंत्री बने रहने देना चाहते हैं।
देश के अन्य राज्यों के कुर्मी समाज के लोग हर राज्य में दर्जनों नेता बनाकर उस राज्य के मुख्यमंत्री बनाने समेत केन्द्र में प्रधानमंत्री भी कुर्मी समाज से बनाने के लिए व्याकुल है पर इसके लिए कुर्मी समाज के 126 वर्ष पुराने संगठन “अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा” समेत अन्य कुर्मी संगठनों के पदाधिकारी गण द्वारा कोई सकारात्मक कोशिश नहीं की जा रही है। जिसके कारण देश के विभिन्न राज्यों के कुर्मी शाखाओं और उपजातियों के लोग राजनीति में दिशाहीन बने हुए हैं जिसका लाभ सवर्ण और अन्य जातियों के लोग उठा रहे हैं। अखिल भारतीय कूर्मि क्षत्रिय महासभा 2008 से दो – तीन गुटों में बंटकर अस्तित्व बचाने की लड़ाई आपस में ही लड़ रही है वहीं अन्य कुर्मी संगठनों की स्थिति भी दयनीय बनी हुई है।
देश के विभिन्न कुर्मी संगठनों के नेताओं के बीच आपस में संवादहीनता की स्थिति बनी हुई है। कूर्मि संगठनों के पदाधिकारी और नेता अहंकार में आकर आपस में टकराव उत्पन्न करके जातीय संगठनों को मजबूत बनाने की जगह आपस में कटुता फैलाने का दुस्साहस कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश में बिहार से ज्यादा प्रतिशत आबादी होने के बावजूद कुर्मी समाज के लोग विभिन्न संगठनों के माध्यम से विभिन्न टुकड़ों में बंटे हुए हैं और हर कुर्मी संगठन/कुर्मी शाखा के सदस्य खुद को ज्यादा समझदार, ज्यादा ताकतवर और ज्यादा ज्ञानवान बताकर दूसरे कुर्मी संगठनों/कुर्मी शाखाओं को कमतर बता कर नीचा दिखा रहे हैं। कमोवेश छतीसगढ़ का कुर्मी समाज भी फिरकावाद और क्षेत्रवाद का जबरदस्त शिकार है।देश के अन्य राज्यों की भी यही स्थिति है।
उत्तर प्रदेश , मध्यपदेश समेत देश के अन्य राज्यों के कुर्मीयों और कृषक जातियों को राजनैतिक जागृति/शक्ति के सही उपयोग और सत्ता पर अधिकार करने की सकारात्मक नीति सिखना और बनाना पडेगा/ कुर्मी समाज के विभिन्न संगठनों और कुर्मी समाज के विभिन्न शाखाओं और उपजातियों को सामाजिक और राजनैतिक जागृति चलाकर अतिपिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समाज के साथ सामन्जस्य बनाकर अविलम्ब राज्य की सत्ता पर किसी साफ-सुथरे, ईमानदार व कर्तव्यनिष को सत्ता पर अधिकार करने में तन, मन और धन से सहयोग करके अपनी भूमिका सुनिश्चित करना पडेगा ।

अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा समेत अन्य सभी छोटे बड़े कूर्मि संगठनों को भी एक मंच पर आकर अपनी अपनी जवाबदेही सुनिश्चित करनी पडेगी। संभवतः इसी सोच को हकीकत में बदलने के उद्येश्य से बिहार की घरती से 1994 के कुर्मी चेतना महारैली के महानायक सतीश कुमार ने लब -कुश के वंशजों को फिर से आवाज दी है । अक्टुबर माह में न केबल बिहार के कोने – कोने से बल्कि पुरे देश में बसे लव – कुश कुल के योद्धा हाथों में ध्वज धारण कर पटना की सड़कों और गलियों से विचरते हुए गाँधी मैदान में एकत्र होकर अपनी एकता और सामाजिक -राजनीतिक संकल्प को दुहरायेगें ।
इसलिए अपने सारे आपसी विवाद भूलाकर बड़े उदेश्य को पूरा करने के लिए आपस में सामन्जस्य बनाकर मिलकर संगठित होकर लव -कुश वंशजों को अपने हक और अधिकार की संकल्प पूर्ति की कोशिश में अपने -अपने हिस्से का योगदान करना ही पडेगा क्योंकि इसके सिवा दुसरा कोई रास्ता नही है।



