स्वर्गीय केयूर भूषण को सम्मानित करने उनकी जीवनी को छत्तीसगढ़ के पाठ्यक्रमों में शामिल करे सरकार – संजीव अग्रवाल

रायपुर(khabar warrior)- केयूर भूषण ने 90 साल की उम्र में रायपुर के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली थी, वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी की सरकार ने उन्हें पहला पंडित रविशंकर शुक्ल संप्रादायिक सद्भाव सम्मान से नवाजा था। केयूर भूषण का जन्म 1 मार्च 1928 को बेमेतरा के नज़दीक जांता गांव में हुआ था। छत्तीसगढ़ के गाँधीवादी नेता और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केयूर भूषण को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई थी। रायपुर के महादेव घाट में बड़ी तादाद में लोगों ने उनके अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया था।

आखिरी समय तक केयूर भूषण छत्तीसगढ़ के हितों को लेकर चिंतित रहे। वे एक ऐसे नेता थे जिन्होंने 1942 के असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेकर महात्मा गांधी के दिल में जगह बनाई थी। महात्मा गांधी उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते पहचानते और पसंद करते थे। अंग्रेज़ी हुक़ूमत के दौरान वर्ष 1942 में वे रायपुर के सेंट्रल जेल में सबसे कम उम्र के राजनीतिक बंदी थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन गाँधीवादी तरीके से बिताया। जीवन के आखिरी वर्षों भी वे साइकिल चलाना ही पसंद करते थे। देश की आज़ादी की लड़ाई में महज़ 14 वर्ष की उम्र में शामिल वाले केयूर भूषण ने अपनी जिंदगी के 9 वर्ष जेल में बिताए। उस समय वे रायपुर केंद्रीय जेल में सबसे कम उम्र के राजनीतिक बंदी थे। भारत छोड़ो आंदोलन समेत कई बार वे जेल भी गए।

देश आज़ाद होने के बाद उन्होंने गोवा की आज़ादी के लिए भी संघर्ष किया। इसके बाद 1960 से वे पृथक छत्तीसगढ़ राज्य के लिए संघर्ष कर रहे थे। वो दो बार वर्ष 1980 से 1984 और फिर 1984 से 1989 तक रायपुर संसदीय सीट से सांसद भी रहे। केयूर को छत्तीसगढ़ से ऐसा गहरा लगाव था कि कालांतर में वे खुद इस प्रदेश की संस्कृति और साहित्य की पहचान बन गए। केयूर भूषण समाजिक और राजनीतिक जीवन में सक्रिय रहने के साथ ही बड़े साहित्यकार भी रहे। उन्होंने छत्तीसगढ़ में कई कविता संग्रह और उपन्यास की रचना की इनमें ‘कुल के मरजाद’ और ‘कहां बिलागे मोर धान के कटोरा’ बेहद चर्चित उपन्यास रहे।

रायपुर के महादेव घाट में केयूर भूषण को श्रद्धांजलि देने के लिए लोगों का तांता लगा था। तमाम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता, नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, कला और संस्कृति से जुड़े लोगों के अलावा सैकड़ों ऐसे लोग भी मौजूद थे जो आज़ादी के बाद उनके गाँधीवादी दर्शन से प्रभावित होकर उनके जैसी जीवनशैली में अपने को ढाल रहे थे। केयूर भूषण को अंतिम विदाई देने महादेव घाट पहुंचे मुख्यमंत्री रमन सिंह ने शोक व्यक्त किया था। साथ ही उन्होंने कहा था कि केयूर भूषण के निधन से न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि पूरे देश ने सच्चाई और सादगी पर आधारित गाँधीवादी दर्शन और विनोबा जी की सर्वोदय विचारधारा के एक महान चिंतक को हमेशा के लिए खो दिया है। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने कहा था कि स्वर्गीय केयूर भूषण छत्तीसगढ़ राज्य के सच्चे हितैषी थे।

संजीव अग्रवाल ने उपरोक्त जानकारी मीडिया से साझा करते हुए बताया कि एक गाँधीवादी काँग्रेस नेता को तत्कालीन काँग्रेस सरकार में छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी ने पहले पंडित रविशंकर शुक्ल संप्रादायिक सद्भाव सम्मान से नवाज़ा था लेकिन उसके बाद भाजपा सरकार ने उनकी अनदेखी की। लेकिन दुखद है कि 2018 में छत्तीसगढ़ में काँग्रेस की सरकार आने के बाद शायद अब तक सरकार को ऐसे महान व्यक्तित्व की याद नहीं आई। न अब तक सरकार ने उनके नाम पर कोई सम्मान दिया है और न ही उनके सम्मान स्वरूप उनके नाम पर कोई योजना ही आरम्भ की है।

अतः मैं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से अपील करता हूँ कि छत्तीसगढ़ के महान गाँधीवादी नेता स्वर्गीय केयूर भूषण जी को यथासंभव सम्मान दें और छत्तीसगढ़ के पाठ्यक्रमों में उनके जीवनकाल को सम्मिलित करें जिससे आने वाली पीढ़ी ऐसे महान व्यक्तित्व के जीवन को जानें और उनके आदर्शों का अनुसरण करें।