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आत्मा के साथ परलोक तक जाता है “गोदना”

गोदना!

मनोज शर्मा✍️


“गोदना”शब्द का शाब्दिक अर्थ है चुभाना। शरीर में सुई चुभोकर उसमें काले या नीले रंग का लेप लगाकर गोदना कलाकृति बनाई जाती है। गोदना गोदने वाली महिला को बदनिन कहा जाता है। कुछ अनाज व रुपए के बदले ये महिला शरीर पर गोदना बना देती है। गोदने के रंग के लिए रामतिल तेल के काजल को तेल या पानी के साथ मिलाकर लेप तैयार किया जाता है। इसी लेप में सुईयों को डूबोकर शरीर में चुभा कर गोदना की मनमोहक आकृतियां बनाई जाती हैं। आकृतियां बनाने के बाद अच्छी तरह धोकर इसमें अरंडी तेल और हल्दी का लेप लगाया जाता है। ताकि सूजन ना आए। गोदना प्रथा बस्तर की संस्कृति से जुडी हुई है।

बस्तर अंचल की अबुझमाडियां दण्डामी माडियां, मुरिया, दोरला, परजा, घुरुवा जनजाति की महिलाओं में गोदना गुदवाने का रिवाज पारम्परिक है।

गोदना प्रथा को पूर्वज अधिक मानते थे।
माना जाता है कि मृत्यु के उपरांत भौतिक जगत की सभी वस्तुएं, या आभूषण इसी लोक में छूट जाते हैं, लेकिन गोदना आत्मा के साथ परलोक तक जाता है।

मान्यता जो भी हो पर एक बात बिल्कुल स्पष्ट है। कि आदिवासी भले ही रुढीवादी हो, जाने अनजाने में अपनी पुरानी संस्कृति और परम्परा को आज भी बचाये हुये हैं। इस डूबती हुई गोदना प्रथा को जीवित रखने से ही जनजातीय संस्कृति को संरक्षित किया जा सकता है।

(लेखक बस्तर में फोटोजर्नलिस्ट हैं)

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