
दुर्ग/बिलासपुर– ग्राम चिंगरी में मछुआ सहकारी समिति के गठन और पंजीयन को लेकर चल रहे विवाद में अब नया मोड़ आ गया है। दुर्ग कलेक्टर द्वारा 7 सितंबर 2026 को पारित उस आदेश, जिसके तहत ग्राम पंचायत चिंगरी की ओर से 25 अप्रैल 2025 को जारी अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) को प्रभावित करते हुए पंजीयन की प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करने के निर्देश दिए गए थे, के प्रभाव एवं संचालन पर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर ने अंतरिम रोक लगा दी है।
माननीय हाईकोर्ट ने 18 सितंबर 2026 को WPC No.4739/2026, यशवंत धीवर बनाम छत्तीसगढ़ शासन में सुनवाई करते हुए आदेश दिया कि 7 सितंबर 2026 के कलेक्टर आदेश का “effect and operation” अगली सुनवाई तक स्थगित रहेगा। कोर्ट ने प्रतिवादी क्रमांक 5 से 7 को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है और सेवा रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद प्रकरण को सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं।
कलेक्टर के समक्ष सरपंच और याचिकाकर्ता ने रखे थे नियम-कानून
मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि कलेक्टर के समक्ष हुई 11 महीने की कार्यवाही के दौरान ग्राम पंचायत के सरपंच ने भी अपने बयान में नियम-कानून और पंचायत संबंधी प्रावधानों का उल्लेख किया था। वहीं याचिकाकर्ता यशवंत धीवर की ओर से भी कलेक्टर के समक्ष अपने पक्ष में लागू नियम, कानून और धाराओं का उल्लेख करते हुए बयान एवं अभिलेख प्रस्तुत किए गए थे।
याचिकाकर्ता का मुख्य आरोप है कि इन तमाम विधिक तथ्यों के बावजूद कलेक्टर के आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि ग्राम पंचायत द्वारा 25 अप्रैल 2025 को ग्राम सभा में पारित प्रस्ताव अथवा उसके आधार पर जारी NOC में पंचायत राज अधिनियम की कौन-सी विशिष्ट धारा या कौन-से नियम का उल्लंघन हुआ था।
याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि जिस कार्यवाही के लिए नियमानुसार अपीलीय व्यवस्था उपलब्ध थी, उसमें कलेक्टर के समक्ष पुनरीक्षण के माध्यम से कार्यवाही की गई और कलेक्टर ने उस पर निर्णय पारित कर दिया।
छत्तीसगढ़ पंचायत (अपील एवं पुनरीक्षण) नियम, 1995 के नियम 5 में पुनरीक्षण की सीमाएं निर्धारित हैं तथा appealable order के विरुद्ध revision application entertain न किए जाने का प्रावधान है।
ग्राम सभा के प्रस्ताव और NOC पर उठे सवाल
याचिकाकर्ता का कहना है कि ग्राम पंचायत चिंगरी की ग्राम सभा में 25 अप्रैल 2025 को विधिवत प्रस्ताव पारित हुआ था और उसी आधार पर NOC जारी की गई। इसके बाद उसी NOC को आधार मानकर सहकारिता विभाग में समिति के पंजीयन की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
याचिकाकर्ता के अनुसार सहकारिता विभाग ने दस्तावेजों को मत्स्य विभाग की ओर भेजा, जिसके बाद संबंधित स्तर पर परीक्षण और अनुशंसा की प्रक्रिया भी पूरी हुई तथा मामला आगे संचालक मत्स्य पालन, रायपुर तक पहुंचा। याचिकाकर्ता का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया के बाद जब केवल पंजीयन क्रमांक और प्रमाण-पत्र जारी होना शेष था, तभी कलेक्टर के आदेश से पूरी प्रक्रिया फिर से विवाद में आ गई।
20 ग्रामीणों को साथ लेकर समिति बनाने की पहल
याचिका के अनुसार यशवंत धीवर ने ग्राम चिंगरी के करीब 20 ग्रामीणों को साथ लेकर मछुआ सहकारी समिति गठित करने की पहल की थी। समिति के गठन एवं पंजीयन के लिए आवश्यक आवेदन, दस्तावेज और विभागीय प्रक्रियाएं पूरी की गईं।
याचिकाकर्ता का दावा है कि विधिवत प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी पंजीयन अंतिम चरण में अटक गया। कलेक्टर के 7 सितंबर के आदेश से ग्राम पंचायत की पूर्व NOC को प्रभावित करते हुए पंजीयन प्रक्रिया को नए सिरे से प्रारंभ करने की स्थिति उत्पन्न हुई, जिसके कारण समिति के गठन में शामिल ग्रामीणों को आर्थिक और अन्य कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
हाईकोर्ट का आदेश बना राहत की किरण
इसी आदेश से व्यथित होकर यशवंत धीवर ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 18 सितंबर को हुई सुनवाई में उनके अधिवक्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष कहा कि 25 अप्रैल 2025 को ग्राम सभा/ग्राम पंचायत ने सर्वसम्मति से NOC प्रदान की थी और उसके आधार पर पंजीयन संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ी थी। कलेक्टर द्वारा 7 सितंबर के आदेश से उस स्थिति को प्रभावित किया गया।
हाईकोर्ट ने मामले में तत्काल अंतरिम राहत देते हुए कलेक्टर के 7 सितंबर 2026 के आदेश के प्रभाव एवं संचालन पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी। यह आदेश फिलहाल अंतरिम है; प्रकरण का अंतिम निर्णय अभी होना बाकी है।
“सहकार से समृद्धि” और मछुआरों की पंजीयन प्रक्रिया पर भी सवाल
याचिकाकर्ता पक्ष का कहना है कि केंद्र सरकार द्वारा सहकारिता और मत्स्य क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए संचालित योजनाओं के दौर में यदि स्थानीय स्तर पर विधिवत प्रक्रिया पूरी करने के बाद भी मछुआ सहकारी समिति का पंजीयन विवादों में फंसता है, तो इसका सीधा असर ग्रामीण मछुआरों पर पड़ता है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि समिति के पंजीयन के लिए अब केवल पंजीयन क्रमांक और प्रमाण-पत्र प्राप्त होना शेष है, लेकिन प्रशासनिक एवं न्यायिक विवाद के कारण प्रक्रिया लंबित होती चली गई। उनका कहना है कि एक गरीब मछुआरे को अपने अधिकार और अपनी समिति के पंजीयन के लिए जिला स्तर से लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट तक जाना पड़ रहा है।
“हार नहीं मानी, हाईकोर्ट से मिली उम्मीद”
यशवंत धीवर पक्ष का कहना है कि आर्थिक और शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपनी कोशिश नहीं छोड़ी। उनका कहना है कि ग्राम सभा की NOC, विभागीय प्रक्रिया और अनुशंसा के बाद भी यदि पंजीयन का रास्ता रोका जाता है तो यह उन ग्रामीण मछुआरों के लिए गंभीर परेशानी है जो सहकारी समिति के माध्यम से अपने रोजगार और मत्स्य व्यवसाय को आगे बढ़ाना चाहते हैं।
फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश से कलेक्टर के 7 सितंबर के आदेश का प्रभाव और संचालन फ़िलहाल अंतरिम रूप से रुक गया है।



