
रायपुर (खबरवारियर ) जामुन की फसल और मौसम की भविष्यवाणी को लेकर अंध श्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र ने कहा,जामुन की बंपर फसल और कम बारिश या सूखे के बीच कोई वैज्ञानिक संबंध नहीं है। पिछले दिनों से सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले अनेक दावे केवल एक लोक मान्यता हैं। जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।
डॉ. मिश्र ने कहा
सोचने की बात है कि क्या सचमुच जामुन का पेड़ आने वाले मौसम की भविष्यवाणी कर सकता है?
क्या किसी साल पेड़ पर ज्यादा फल लगना या जमीन पर बड़ी मात्रा में जामुन गिरना इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण है कि बारिश कम होगी या सूखा पड़ेगा।

जबकि सच्चाई यह है कि यह सिर्फ लोक विश्वास है: ग्रामीण इलाकों में पुराने समय से यह माना जाता रहा है कि अगर किसी साल जामुन ज्यादा आते हैं, तो उस साल सूखा पड़ सकता है।
यह मानव मनोविज्ञान ही है लोग उस साल को हमेशा याद रखते हैं जब जामुन ज्यादा हुआ और बारिश कम हुई, लेकिन वे उन सालों को भूल जाते हैं जब जामुन ज्यादा होने के बाद भी अच्छी बारिश हुई थी। इसे ‘पुष्टिकरण पूर्वाग्रह’ (Confirmation Bias) कहा जाता है।
जामुन ज्यादा होने का असली कारण क्या है?
पहला है,शुष्क मौसम: जामुन के पेड़ों में फूल आने और परागण (Pollination) के समय यदि मौसम सूखा और साफ रहे, तो फल ज्यादा मात्रा में टिकते हैं।
दूसरा कारण है पर्यावरण का असर: पिछले महीनों की अनुकूल स्थिति और तापमान के कारण पेड़ों की पैदावार अच्छी हो जाती है।
डॉ दिनेश मिश्र ने कहा की इस वर्ष जामुन की भरपूर फसल और कम पानी गिरने के भ्रामक दावों के संबंध संबंध में वैज्ञानिक सच्चाई यह है कि ,पेड़ वर्तमान मौसम की परिस्थिति के अनुसार फल देते हैं,पेड़ भविष्य में आने वाले सूखे की भविष्यवाणी करने वाले यंत्र नहीं होते हैं।
डॉ मिश्र ने कहा सच्चाई तो यही है कि इस वर्ष की भारी बारिश ने जामुन की फसल और कम पानी गिरने की भविष्यवाणियों और दावों को खारिज कर दिया है, आम लोगों को ऐसे दावों से भ्रमित नहीं होना चाहिए।
लोक मान्यता और वायरल दावे:
ग्रामीण इलाकों में ऐसा माना जाता है कि जब जामुन या अन्य पेड़ों पर जरूरत से ज्यादा फल आते हैं, तो यह आने वाले सूखे या कम बारिश का संकेत होता है।
तर्क: सोशल मीडिया पर यह दावा किया जाता है कि पेड़ जल संकट या सूखे को भांपकर (‘स्ट्रेस फ्रूटिंग’ या ‘मास्टिंग’) अपनी प्रजाति बचाने के लिए अधिक फल देते हैं।
सलाह: विशेषज्ञों की राय है कि इस तरह के सोशल मीडिया संदेशों या लोक विश्वासों के बजाय मौसम विभाग के आधिकारिक पूर्वानुमानों पर भरोसा करना चाहिए।



