एक गाँव ऐसा जहां तीन दिनों बाद मनता है”दशहरा”
“५० वर्षों से अधिक समय से चली आ रही अनोखी परंपरा’


दुर्ग (खबरवरियर )–वैसे तो पुरे भारत में विजयादशमी का पर्व दशहरा रामनवमी के पश्चात दशमी के तिथि वाले दिन मनाया जाता है।लेकिन दुर्ग जिले में स्थित ग्राम बोरई में दशहरा दशमी को नहीं बल्कि तीन दिन बाद क्वांर मांह के तेरस के दिन मनाया जाता है।
ऐसे हुई शुरुआत और बनी परंपरा
तेरस के दिन दशहरा मनाने के पीछे की कहानी बड़ी रोचक है।लगभग 50वर्षों से भी पूर्व की बातें गाँव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं की उन दिनों गाँव के लोगों के ही द्वारा गाँव में रामलीला का मंचन ११ दिनों तक किया जाता था, रामलीला बड़ा रोचक होता था।और उसकी की प्रसिद्धि इतनी थी की आसपास के गाँव के लोग रोज रामलीला देखने बोरई आते थे दूर गाँव के लोग भी अपने सगे सम्बन्धियों के यहाँ आकर रुकते थे।उस समय ऐसा कोई घर नही होता था जहाँ मेहमान न रहते हों।

एक दिन आस पास के ग्रामीण इकठ्ठा होकर बोरई के ग्राम प्रधान के पास एक प्रस्ताव लेकर पहुंचे कि सभी जगह दशमी को एक सांथ दशहरा उत्सव के छोटे आयोजन होते है.जिसमे लोग शामिल होते हैं लेकिन बोरई के रामलीला को कोई छोड़ना भी नही चाहता अगर बोरई का आयोजन तीन दिन बाद रखा जाए तो और अधिक लोगों का समावेश होगा।इतना सुनते ही ग्राम प्रधान ने तुरंत ही हामी भर दी .और तब से आजतक रामलीला की वजह से ही तेरस की तिथि के दिन दशहरा उत्सव मनाने शुरुआत हुई जो एक परंपरा के रूप में आजपर्यंत जारी है।
इस वर्ष भी होगा भव्य आयोजन
ग्राम बोरई मे पूर्व वर्षों की भांति इस वर्ष भी तेरस यानी 23 अक्टूबर दिन शुक्रवार को दशहरा का पर्व बड़े धूमधाम से मनाने की तैयारी चल रही है,और रात्रि मे सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति भी होगी।

हलाकि इस आधुनिकता के दौड़ में अब कुछ धार्मिक व् सामाजिक परम्पराएं पीछे छुटते दिखाई देती है और व्यस्तताओं की वजह से इसका आयोजन अब सिमटने लगा है और 11 दिनों, का आयोजन अब 3 दिनों में सिमट कर रह गया है।लेकिन बोरई में आज भी लोगों की अपार भीड़ के बीच तेरस को उतने ही हर्षोल्लास के सांथ विजयदशमीं का पर्व मनाया जाता है।
भगवान् श्रीराम की भूमिका निभाने वाले कलाकारों ने ऐसे साझा किए अपने अनुभव
अपने किशोरावस्था में भगवान् श्रीराम की भूमिका निभाने वाले केवेंद्र देशमुख और देवेन्द्र सिन्हा अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं की उन दिनों सारें कलाकारों को तीन महीने पहले ही उनके संवाद दे दिए जाते थे, और गणेश पक्ष से ही रिहर्सल करना शुरू कर देते थे। वे कहते हैं कि उन्हें जब भगवान राम के रूप में पूजा जाता था तब वे अपने आपको अलौकिक दुनिया से जुड़े हुए महसूस करते थे। ऐसे आयोजन हमारी धार्मिक परम्पराओं का धरोहर है।
गाँव के पूर्व ग्राम प्रधान एवं पूर्व सरपंच संघ अध्यक्ष रिवेंद्र यादव का मानना है कि आधुनिकता की दौड़ में पारंपरिक आयोजनों का स्वरुप जरूर परिवर्तित हुआ है,लेकिन युवा पीढ़ी पूर्वजों की परम्पराओं के निर्वहन में लगे हैँ, और इस वर्ष भी विजयादशमी का पर्व ग्राम बोरई में बड़े ही हर्षोल्लास के सांथ मनाया जाएगा। हम भी उम्मीद करते हैं आधुनिकता और मंहगाई के इस दौर मे परंपराएं और त्योहारों की रौनक हमेशा बनी रहेगी।



